महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकिरीटी बलवान् पार्थः कृतास्त्रश्च महारथः । को हि पाण्डुसुतं युद्धे विषहेत धनंजयम् ॥ ६ ॥ ‘कुन्तीपुत्र किरीटधारी महारथी अर्जुन बलवान् तथा अस्त्रविद्यामें निपुण हैं। कौन ऐसा वीर है, जो युद्धमें पाण्डुपुत्र अर्जुनका वेग सह सके? ॥ ६ ॥ अपि वज्रधरः साक्षात् किमुतान्ये धनुर्भृतः । त्रयाणामपि लोकानां समर्थ इति मे मतिः ॥ ७ ॥ ‘साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी युद्धमें उनका सामना नहीं कर सकते; फिर दूसरे धनुर्धरोंकी बात ही क्या है? मेरा तो ऐसा विश्वास है कि अर्जुन तीनों लोकोंका सामना करनेमें समर्थ हैं’ ॥ ७ ॥ भीष्मे ब्रुवति तद् वाक्यं धृष्टमाक्षिप्य मन्युना । दुर्योधनं समालोक्य कर्णो वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥ भीष्मजी इस प्रकार कह ही रहे थे कि कर्णने दुर्योधनकी ओर देखकर क्रोधसे धृष्टतापूर्वक आक्षेप करते हुए (भीष्मजीके कथनकी अवहेलना करके) यह बात कही—॥ ८ ॥
न तत्राविदितं ब्रह्मँल्लोके भूतेन केनचित् ।