भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1521

इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा हैं और देवताओंको हवि पहुँचानेवाले हैं। इसके अतिरिक्त वे

भगवान्‌के मुख भी माने जाते हैं। इसीलिये अग्नि (पावक)-को भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है।

३. समस्त नक्षत्र सुमेरु पर्वतकी परिक्रमा करते हैं और सुमेरु पर्वत नक्षत्र और द्वीपोंका केन्द्र तथा

सुवर्ण और रत्नोंका भण्डार माना जाता है तथा उसके शिखर अन्य पर्वतोंकी अपेक्षा ऊँचे हैं। इस प्रकार

शिखरवाले पर्वतोंमें प्रधान होनेसे सुमेरुको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है।

४. बृहस्पति देवराज इन्द्रके गुरु, देवताओंके कुलपुरोहित और विद्या-बुद्धिमें सर्वश्रेष्ठ हैं तथा संसारके

समस्त पुरोहितोंमें मुख्य और अंगिरसोंके राजा माने गये हैं। इसलिये भगवान्‌ने उनको अपना स्वरूप कहा

है।

५. स्कन्दका दूसरा नाम कार्तिकेय है। इनके छः मुख और बारह हाथ हैं। ये महादेवजीके पुत्र और

देवताओंके सेनापति हैं। कहीं-कहीं इन्हें अग्निके तेजसे तथा दक्षकन्या स्वाहाके द्वारा उत्पन्न माना गया है

(महाभारत, वनपर्व २२३)। इनके सम्बन्धमें महाभारत और पुराणोंमें बड़ी ही विचित्र-विचित्र कथाएँ

मिलती हैं। संसारके समस्त सेनापतियोंमें ये प्रधान हैं, इसीलिये भगवान्‌ने इनको अपना स्वरूप बतलाया

है।

६. महर्षि बहुत-से हैं, उनके लक्षण और उनमेंसे प्रधान दसके नाम ये हैं—

ईश्वराः स्वयमुद्भूता मानसा ब्रह्मणः सुताः । यस्मान्न हन्यते मानैर्महान् परिगतः पुरः ।।

यस्मादृषन्ति ये धीरा महान्तं सर्वतो गुणैः । तस्मान्महर्षयः प्रोक्ता बुद्धेः परमदर्शिनः ।।

भृगुर्मरीचिरत्रिश्च अंगिराः पुलहः क्रतुः । मनुर्दक्षो वसिष्ठश्च पुलस्त्यश्चेति ते दश ।।

ब्रह्मणो मानसा ह्येत उद्भूताः स्वयमीश्वराः । प्रवर्तत ऋषेर्यस्मान्महांस्तस्मान्महर्षयः ।।

(वायुपुराण ५९।८२-८३, ८९-९०)

'ब्रह्माके ये मानस पुत्र ऐश्वर्यवान् (सिद्धियोंसे सम्पन्न) एवं स्वयं उत्पन्न हैं। परिमाणसे जिसका हनन न

हो (अर्थात् जो अपरिमेय हो) और जो सर्वत्र व्याप्त होते हुए भी सामने (प्रत्यक्ष) हो, वही महान् है। जो

बुद्धिके पार पहुँचे हुए (भगवत्प्राप्त) विज्ञजन गुणोंके द्वारा उस महान् (परमेश्वर)-का सब ओरसे

अवलम्बन करते हैं, वे इसी कारण ('महान्तम् ऋषन्ति इति महर्षयः' इस व्युत्पत्तिका अनुसार) महर्षि

कहलाते हैं। भृगु, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलह, क्रतु, मनु, दक्ष, वसिष्ठ और पुलस्त्य—ये दस महर्षि हैं। ये

सब ब्रह्माके मनसे स्वयं उत्पन्न हुए हैं और ऐश्वर्यवान् हैं। चूँकि ऋषि (ब्रह्माजी)-से इन ऋषियोंके रूपमें

स्वयं महान् (परमेश्वर) ही प्रकट हुए, इसलिये ये महर्षि कहलाये।'

महर्षियोंमें भृगुजी मुख्य हैं। ये भगवान्‌के भक्त, ज्ञानी और बड़े तेजस्वी हैं; इसीलिये इनको भगवान्‌ने

अपना स्वरूप बतलाया है।

१. किसी अर्थका बोध करानेवाले शब्दको 'गी:' (वाणी) कहते हैं और ओंकार (प्रणव)-को 'एक अक्षर'

कहते हैं (गीता ८।१३)। जितने भी अर्थबोधक शब्द हैं, उन सबमें प्रणवकी प्रधानता है; क्योंकि 'प्रणव'

भगवान्‌का नाम है (गीता १७।२३)। प्रणवके जपसे भगवान्‌की प्राप्ति होती है। नाम और नामीमें अभेद

माना गया है। इसलिये भगवान्‌ने 'प्रणव' को अपना स्वरूप बतलाया है।

२. जपयज्ञमें हिंसाका सर्वथा अभाव है और जपयज्ञ भगवान्‌का प्रत्यक्ष करानेवाला है। मनुस्मृतिमें भी

जपयज्ञकी बहुत प्रशंसा की गयी है—

विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्त्रो मानसः स्मृतः ।।

(२।८५)

'विधियज्ञसे जपयज्ञ दसगुना, उपांशुजप सौगुना और मानसजप हजारगुना श्रेष्ठ कहा गया है।'

इसलिये समस्त यज्ञोंमें जपयज्ञकी प्रधानता है, यह भाव दिखलानेके लिये भगवान्‌ने जपयज्ञको

अपना स्वरूप बतलाया है।

३. स्थिर रहनेवालोंको स्थावर कहते हैं। जितने भी पहाड़ हैं, सब अचल होनेके कारण स्थावर हैं। उनमें

हिमालय सर्वोत्तम है। वह परम पवित्र तपोभूमि है और मुक्तिमें सहायक है। भगवान् नर और नारायण वहीं

तपस्या कर चुके हैं। साथ ही, हिमालय सब पर्वतोंका राजा भी है। इसीलिये उसको भगवान्‌ने अपना

स्वरूप बतलाया है।

४. पीपलका वृक्ष समस्त वनस्पतियोंमें राजा और पूजनीय माना गया है। पुराणोंमें अश्वत्थका बड़ा

माहात्म्य मिलता है। स्कन्दपुराणमें कहा है—