भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1523

८. कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त और बर्हिषद्—ये सात दिव्य पितृगण हैं।

(शिवपुराण धर्म० ६३।२) इनमें अर्यमा नामक पितर समस्त पितरोंमें प्रधान होनेसे श्रेष्ठ माने गये हैं।

इसलिये उनको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है।

९. मर्त्य और देवजगत्में, जितने भी नियमन करनेवाले अधिकारी हैं, यमराज उन सबमें बढ़कर हैं।

इनके सभी दण्ड न्याय और धर्मसे युक्त, हितपूर्ण और पापनाशक होते हैं। ये भगवान्के ज्ञानी भक्त और

लोकपाल भी हैं। इसीलिये भगवान्ने इनको अपना स्वरूप बतलाया है।

१०. यहाँ 'काल' शब्द क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि नामोंसे कहे जानेवाले समयका वाचक है। यह

गणितविद्याके जाननेवालोंकी गणनाका आधार है। इसलिये कालको भगवान्ने अपना स्वरूप बतलाया है।

११. दितिके वंशजोंको दैत्य कहते हैं। उन सबमें प्रह्लाद उत्तम माने गये हैं; क्योंकि वे सर्वसद्गुणसम्पन्न,

परम धर्मात्मा और भगवान्के परम श्रद्धालु, निष्काम, अनन्यप्रेमी भक्त हैं तथा दैत्योंके राजा हैं। इसलिये

भगवान्ने उनको अपना स्वरूप बतलाया है।

१२. सिंह सब पशुओंका राजा माना गया है। वह सबसे बलवान्, तेजस्वी, शूरवीर और साहसी होता है।

इसलिये भगवान्ने सिंहको अपनी विभूतियोंमें गिना है।

१३. विनताके पुत्र गरुड़जी पक्षियोंके राजा और उन सबसे बड़े होनेके कारण पक्षियोंमें श्रेष्ठ माने गये

हैं। साथ ही ये भगवान्के वाहन, उनके परम भक्त और अत्यन्त पराक्रमी हैं। इसलिये गरुड़को भगवान्ने

अपना स्वरूप बतलाया है।

१. 'राम' शब्द दशरथपुत्र भगवान् श्रीरामचन्द्रजीका वाचक है। उनको अपना स्वरूप बतलाकर

भगवान्ने यह भाव दिखलाया है कि भिन्न-भिन्न युगोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारकी लीला करनेके लिये मैं ही

भिन्न-भिन्न रूप धारण करता हूँ। श्रीराममें और मुझमें कोई अन्तर नहीं है, स्वयं मैं ही श्रीरामरूपमें

अवतीर्ण होता हूँ।

२. जितने प्रकारकी मछलियाँ होती हैं, उन सबमें मगर बहुत बड़ा और बलवान् होता है; इसी

विशेषताके कारण मछलियोंमें मगरको भगवान्ने अपनी विभूति बतलाया है।

३. जाह्नवी अर्थात् श्रीभागीरथी गङ्गाजी समस्त नदियोंमें परम श्रेष्ठ हैं; ये श्रीभगवान्के चरणोदकसे

उत्पन्न, परम पवित्र हैं। पुराण और इतिहासोंमें इनका बड़ा भारी माहात्म्य बतलाया गया है। श्रीमद्भागवतमें

कहा है—

धातुः कमण्डलुजलं तदुरुक्रमस्य पादावनेजनपवित्रतया नरेन्द्र।

स्वर्धुन्द्यभून्नभसि सा पतती निमार्ष्टि लोकत्रयं भगवतो विशदेव कीर्तिः ।।

(८।२१।४)

'हे राजन्! वह ब्रह्माजीके कमण्डलुका जल, भगवान्के चरणोंको धोनेसे पवित्रतम होकर स्वर्ग-गंगा

हो गया। वह गंगा आकाशसे पृथ्वीपर गिरकर अबतक तीनों लोकोंको भगवान्की निर्मल कीर्तिके समान

पवित्र कर रही है। '

इसके अतिरिक्त यह बात भी है कि एक बार भगवान् विष्णु स्वयं ही द्रवरूप होकर बहने लगे थे और

ब्रह्माजीके कमण्डलुमें जाकर गंगारूप हो गये थे। इस प्रकार साक्षात् ब्रह्मद्रव होनेके कारण भी गंगाजीका

अत्यन्त माहात्म्य है। इसीलिये भगवान्ने गंगाको अपना स्वरूप बतलाया है।

४. अध्यात्मविद्या या ब्रह्मविद्या उस विद्याको कहते हैं जिसका आत्मासे सम्बन्ध है, जो आत्मतत्त्वका

प्रकाश करती है और जिसके प्रभावसे अनायास ही ब्रह्मका साक्षात्कार हो जाता है। संसारमें ज्ञात या

अज्ञात जितनी भी विद्याएँ हैं, सभी इस ब्रह्मविद्यासे निकृष्ट हैं; क्योंकि उनसे अज्ञानका बन्धन टूटता नहीं,

बल्कि और भी दृढ़ होता है; परंतु इस ब्रह्मविद्यासे अज्ञानकी गाँठ सदाके लिये खुल जाती है और

परमात्माके स्वरूपका यथार्थ साक्षात्कार हो जाता है। इसीसे यह सबसे श्रेष्ठ है और इसीलिये भगवान्ने

इसको अपना स्वरूप बतलाया है।

५. शास्त्रार्थके तीन स्वरूप होते हैं—जल्प, वितण्डा और वाद। उचित-अनुचितका विचार छोड़कर

अपने पक्षके मण्डन और दूसरेके पक्षका खण्डन करनेके लिये जो विवाद किया जाता है, उसे 'जल्प'

कहते हैं; केवल दूसरे पक्षका खण्डन करनेके लिये किये जानेवाले विवादको 'वितण्डा' कहते हैं और जो

तत्त्वनिर्णयके उद्देश्यसे शुद्ध नीयतसे किया जाता है, उसे 'वाद' कहते हैं। 'जल्प' और 'वितण्डा' से द्वेष,

क्रोध, हिंसा और अभिमानादि दोषोंकी उत्पत्ति होती है तथा 'वाद' से सत्यके निर्णयमें और कल्याण-