भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1525, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1525

संवत्सरका भूषण बतलाया गया है। इस प्रकार अन्यान्य मासोंकी अपेक्षा इसमें कई विशेषताएँ हैं, इसलिये

भगवान्‌ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है।

६. वसन्त सब ऋतुओंमें श्रेष्ठ और सबका राजा है। इसमें बिना ही जलके सब वनस्पतियाँ हरी-भरी और

नवीन पत्रों तथा पुष्पोंसे समन्वित हो जाती हैं। इसमें न अधिक गरमी रहती है और न सरदी। इस ऋतुमें

प्रायः सभी प्राणियोंको आनन्द होता है। इसीलिये भगवान्‌ने इसको अपना स्वरूप बतलाया है।

१. संसारमें उत्तम, मध्यम और नीच जितने भी जीव और पदार्थ हैं, सभीमें भगवान् व्याप्त हैं और

भगवान्‌की ही सत्ता-स्फूर्तिसे सब चेष्टा करते हैं। ऐसा एक भी पदार्थ नहीं है जो भगवान्‌की सत्ता और

शक्तिसे रहित हो। ऐसे सब प्रकारके सात्त्विक, राजस और तामस जीवों एवं पदार्थोंमें जो विशेष गुण,

विशेष प्रभाव और विशेष चमत्कारसे युक्त हैं, उसीमें भगवान्‌की सत्ता और शक्तिका विशेष विकास है।

इस विशेषताके कारण जिस-जिस व्यक्ति, पदार्थ, क्रिया या भावका मनसे चिन्तन होने लगे, उस-

उसमें भगवान्‌का ही चिन्तन करना चाहिये। इसी अभिप्रायसे छल करनेवालोंमें जूएको भगवान्‌ने अपना

स्वरूप बताया है। उसे उत्तम बतलाकर उसमें प्रवृत्त करनेके उद्देश्यसे नहीं; क्योंकि भगवान्‌ने तो महान्

क्रूर और हिंसक सिंह और मगरको एवं सहज ही विनाश करनेवाले अग्निको तथा सर्वसंहारकारी मृत्युको

भी अपना स्वरूप बतलाया है। उसका अभिप्राय यह थोड़े ही है कि कोई भी मनुष्य जाकर सिंह या मगरके

साथ खेले, आगमें कूद पड़े अथवा जान-बूझकर मृत्युके मुँहमें घुस जाय। इनके करनेमें जो आपत्ति है,

वही आपत्ति जूआ खेलनेमें है।

२. ये चारों ही गुण भगवत्प्राप्तिमें सहायक हैं, इसलिये भगवान्‌ने इनको अपना स्वरूप बतलाया है। इन

चारोंको अपना स्वरूप बतलाकर भगवान्‌ने यह भाव भी दिखलाया है कि तेजस्वी प्राणियोंमें जो तेज या

प्रभाव है, वह वास्तवमें मेरा ही है। जो मनुष्य उसे अपनी शक्ति समझकर अभिमान करता है, वह भूल

करता है। इसी प्रकार विजय प्राप्त करनेवालोंका विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक

पुरुषोंका सात्त्विकभाव—ये सब गुण भी मेरे ही हैं। इनके निमित्तसे अभिमान करना भी बड़ी भारी मूर्खता

है। इसके अतिरिक्त इस कथनमें यह भाव भी है कि जिन-जिनमें उपर्युक्त गुण हों, उनमें भगवान्‌के तेजकी

अधिकता समझकर उनको श्रेष्ठ मानना चाहिये।

३. इस कथनसे भगवान्‌ने अवतार और अवतारीकी एकता दिखलायी है। कहनेका भाव यह है कि मैं

अजन्मा-अविनाशी, सब भूतोंका महेश्वर, सर्वशक्तिमान्, पूर्णब्रह्म पुरुषोत्तम ही यहाँ वसुदेवके पुत्रके रूपमें

लीलासे प्रकट हुआ हूँ (गीता ४।६)।

४. अर्जुन ही सब पाण्डवोंमें श्रेष्ठ माने गये हैं। इसका कारण यह है कि नर-नारायण-अवतारमें अर्जुन

नररूपसे भगवान्‌के साथ रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त वे भगवान्‌के परम प्रिय सखा और उनके अनन्य

प्रेमी भक्त हैं। इसलिये अर्जुनको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है। भगवान्‌ने स्वयं कहा है—

नरस्त्वमसि दुर्धर्ष हरिनारायणो ह्यहम्। काले लोकमिमं प्राप्तौ नरनारायणावृषी ।।

अनन्यः पार्थ मत्तस्त्वं त्वत्तश्चाहं तथैव च।

(महा०, वन० १२।४६-४७)

'हे दुर्धर्ष अर्जुन! तू भगवान् नर है और मैं स्वयं हरि नारायण हूँ। हम दोनों एक समय नर और

नारायण ऋषि होकर इस लोकमें आये थे। इसलिये हे अर्जुन! तू मुझसे अलग नहीं है और उसी प्रकार मैं

तुझसे अलग नहीं हूँ।'

५. भगवान्‌के स्वरूपका और वेदादि शास्त्रोंका मनन करनेवालोंको 'मुनि' कहते हैं। भगवान् वेदव्यास

समस्त वेदोंका भलीभाँति चिन्तन करके उनका विभाग करनेवाले, महाभारत, पुराण आदि अनेक

शास्त्रोंके रचयिता, भगवान्‌के अंशावतार और सर्वसद्गुणसम्पन्न हैं। अतएव मुनिमण्डलमें उनकी प्रधानता

होनेके कारण भगवान्‌ने उन्हें अपना स्वरूप बतलाया है।

६. जो पण्डित और बुद्धिमान् हो, उसे 'कवि' कहते हैं। शुक्राचार्यजी भार्गवोंके अधिपति, सब

विद्याओंमें विशारद, नीतिके रचयिता, संजीवनी विद्याके जाननेवाले और कवियोंमें प्रधान हैं, इसलिये

इनको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है।

७. 'ज्ञानवताम्' पद परब्रह्म परमात्माके स्वरूपका साक्षात् कर लेनेवाले यथार्थ ज्ञानियोंका वाचक है।

उनका ज्ञान ही सर्वोत्तम ज्ञान है। इसलिये उसको भगवान्‌ने अपना स्वरूप बतलाया है।