महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअकेले ही सम्पूर्ण सेनासहित छः अतिरथियोंको जीत लिया था ॥ १६ ॥ बहुशो जीयमानस्य कर्म दृष्टं तदैव ते । न चेदेवं करिष्यामो यदयं ब्राह्मणोऽब्रवीत् । ध्रुवं युधि हतास्तेन भक्षयिष्याम पांसुकान् ॥ १७ ॥ तेरा पराक्रम तो उसी समय देखा गया था, जब कि अनेक बार उनके सामने जाकर तुझे परास्त होना पड़ा। इन ब्राह्मणदेवताने जो कुछ कहा है, यदि हमलोग तदनुसार कार्य नहीं करेंगे तो यह निश्चय है कि युद्धमें पाण्डुनन्दन अर्जुनके हाथसे आहत होकर हमें धूल खानी पड़ेगी ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
धृतराष्ट्रस्ततो भीष्ममनुमान्य प्रसाद्य च । अवभर्त्स्य च राधेयमिदं वचनमब्रवीत् ॥ १८ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर धृतराष्ट्रने कर्णको डाँटकर भीष्मजीका सम्मान किया और उन्हें राजी करके इस प्रकार कहा— ॥ १८ ॥ अस्मद्धितं वाक्यमिदं भीष्मः शान्तनवोऽब्रवीत् । पाण्डवानां हितं चैव सर्वस्य जगतस्तथा ॥ १९ ॥ 'शान्तनुनन्दन भीष्मने हमारे लिये यह हितकर बात कही है। इसमें पाण्डवोंका तथा सम्पूर्ण जगत्का भी हित है ॥ १९ ॥ चिन्तयित्वा तु पार्थेभ्यः प्रेषयिष्यामि संजयम् । स भवान् प्रति यात्वद्य पाण्डवानेव मा चिरम् ॥ २० ॥ 'ब्रह्मन्! अब मैं कुछ सोच-विचारकर पाण्डवोंके पास संजयको भेजूँगा। आप पुनः पाण्डवोंके पास ही पधारें, विलम्ब न करें' ॥ २० ॥ स तं सत्कृत्य कौरव्यः प्रेषयामास पाण्डवान् । सभामध्ये समाहूय संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ २१ ॥ तदनन्तर राजा धृतराष्ट्रने उन ब्राह्मणका सत्कार करके उन्हें पाण्डवोंके पास वापस भेजा और सभामें संजयको बुलाकर यह बात कही ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि पुरोहितयाने एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें पुरोहितकी यात्राविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१ ॥