महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1554, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ें(मेरे लिये कर्म करनेवाला) पदका प्रयोग किया है और चौवनवें श्लोकमें यह स्पष्ट घोषणा की है कि अनन्य भक्तिके द्वारा मेरे इस स्वरूपको देखना, जानना और प्राप्त करना सम्भव है। अतएव यहाँ यह समझना चाहिये कि निष्कामभावसे भगवदर्थ और भगवदर्पणबुद्धिसे किये हुए यज्ञ, दान और तप आदि कर्म भक्तिके अंग होनेके कारण भगवान्की प्राप्तिमें हेतु हैं—सकामभावसे किये जानेपर नहीं। अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त यज्ञादि क्रियाएँ भगवान्का दर्शन करानेमें स्वभावसे समर्थ नहीं हैं। भगवान्के दर्शन तो प्रेमपूर्वक भगवान्के शरण होकर निष्कामभावसे कर्म करनेपर भगवत्कृपासे ही होते हैं।
४. भगवान्में ही अनन्य प्रेम हो जाना तथा अपने मन, इन्द्रिय और शरीर एवं धन, जन आदि सर्वस्वको भगवान्का समझकर भगवान्के लिये भगवान्की ही सेवामें सदाके लिये लगा देना—यही अनन्य भक्ति है। इस अनन्य भक्तिको ही भगवान्के देखे जाने आदिमें हेतु बतलाया गया है।
यद्यपि सांख्ययोगके द्वारा भी निर्गुण ब्रह्मकी प्राप्ति बतलायी गयी है और वह सर्वथा सत्य है, परंतु सांख्ययोगके द्वारा सगुण-साकार भगवान्के दिव्य चतुर्भुज रूपके भी दर्शन हो जायँ, ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सांख्ययोगके द्वारा साकाररूपमें दर्शन देनेके लिये भगवान् बाध्य नहीं हैं। यहाँ प्रकरण भी सगुण भगवान्के दर्शनका ही है। अतएव यहाँ केवल अनन्य भक्तिको ही भगवद्दर्शन आदिमें हेतु बतलाना उचित ही है।
१. जो मनुष्य स्वार्थ, ममता और आसक्तिको छोड़कर, सब कुछ भगवान्का समझकर, अपनेको केवल निमित्तमात्र मानता हुआ यज्ञ, दान, तप और खान-पान, व्यवहार आदि समस्त शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंको निष्कामभावसे भगवान्की ही प्रसन्नताके लिये भगवान्के आज्ञानुसार करता है—वह ‘मत्कर्मकृत्’ अर्थात् भगवान्के लिये भगवान्के कर्मोंको करनेवाला है।
२. जो भगवान्को ही परम आश्रय, परम गति, एकमात्र शरण लेनेयोग्य, सर्वोत्तम, सर्वाधार, सर्वशक्तिमान्, सबके सुहृद्, परम आत्मीय और अपने सर्वस्व समझता है तथा उनके किये हुए प्रत्येक विधानमें सदा सुप्रसन्न रहता है—वह ‘मत्परमः’ अर्थात् भगवान्के परायण है।
३. भगवान्में अनन्यप्रेम हो जानेके कारण जो भगवान्में ही तन्मय होकर नित्य-निरन्तर भगवान्के नाम, रूप, गुण, प्रभाव और लीला आदिका श्रवण, कीर्तन और मनन आदि करता रहता है; इनके बिना जिसे क्षणभर भी चैन नहीं पड़ती और जो भगवान्के दर्शनके लिये अत्यन्त उत्कण्ठाके साथ निरन्तर लालायित रहता है—वह ‘मद्भक्तः’ अर्थात् भगवान्का भक्त है।
४. शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन, कुटुम्ब तथा मान-बड़ाई आदि जितने भी इस लोक और परलोकके भोग्य पदार्थ हैं, उन सम्पूर्ण जड़-चेतन पदार्थोंमें जिसकी किंचिन्मात्र भी आसक्ति नहीं रह गयी है; भगवान्को छोड़कर जिसका किसीमें भी प्रेम नहीं है—वह ‘सङ्गवर्जितः’ अर्थात् आसक्तिरहित है।
५. समस्त प्राणियोंको भगवान्का ही स्वरूप समझने अथवा सबमें एकमात्र भगवान्को व्याप्त समझनेके कारण किसीके द्वारा कितना भी विपरीत व्यवहार किया जानेपर भी जिसके मनमें विकार नहीं होता तथा जिसका किसी भी प्राणीमें किंचिन्मात्र भी द्वेष या वैरभाव नहीं रह गया है—वह ‘सर्वभूतेषु निर्वैरः’ अर्थात् समस्त प्राणियोंमें वैरभावसे रहित है।
६. इस कथनका भाव पिछले चौवनवें श्लोकके अनुसार सगुण भगवान्के प्रत्यक्ष दर्शन कर लेना, उनको भलीभाँति तत्त्वसे जान लेना और उनमें प्रवेश कर जाना है।