भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 156

मैंने सदा ढूँढ़ते रहनेपर भी कुन्तीपुत्रोंका कोई ऐसा दोष नहीं देखा है, जिससे उनकी निन्दा करूँ। वे सदा धर्म और अर्थके लिये ही कर्म करते हैं, कामनावश मानसिक प्रीति और स्त्री-पुत्रादि प्रिय वस्तुओंमें नहीं फँसते हैं—कामभोगमें आसक्त होकर धर्मका परित्याग नहीं करते हैं ।। ४ ।।

घर्मं शीतं क्षुत्पिपासे तथैव निद्रां तन्द्रीं क्रोधहर्षौ प्रमादम् । धृत्या चैव प्रज्ञया चाभिभूय धर्मार्थयोगात् प्रयतन्ति पार्थाः ॥ ५ ॥

पाण्डव घाम-शीत, भूख-प्यास, निद्रा-तन्द्रा, क्रोध-हर्ष तथा प्रमादको धैर्य एवं विवेकपूर्ण बुद्धिके द्वारा जीतकर धर्म और अर्थके लिये ही प्रयत्नशील बने रहते हैं ।। ५ ।।

त्यजन्ति मित्रेषु धनानि काले न संवासाज्जीर्यति तेषु मैत्री । यथार्हमानार्थकरा हि पार्था- स्तेषां द्वेष्टा नास्त्याजमीढस्य पक्षे ॥ ६ ॥ अन्यत्र पापाद् विषमान्मन्दबुद्धे- र्दुर्योधनात् क्षुद्रतराच्च कर्णात् । (पुत्रो मह्यं मृत्युवशं जगाम दुर्योधनः संजय रागबुद्धिः । भागं हर्तुं घटते मन्दबुद्धि- र्महात्मनां संजय दीप्ततेजसाम् ॥ ) तेषां हीमौ हीनसुखप्रियाणां महात्मनां संजनयतो हि तेजः ॥ ७ ॥

वे समय पड़नेपर मित्रोंको उनकी सहायताके लिये धन देते हैं। दीर्घकालिक प्रवाससे भी उनकी मैत्री क्षीण नहीं होती है। कुन्तीके पुत्र सबका यथायोग्य सत्कार करनेवाले हैं। अजमीढवंशी हम कौरवोंके पक्षमें पापी, बेईमान तथा मन्दबुद्धि दुर्योधन एवं अत्यन्त क्षुद्र स्वभाववाले कर्णको छोड़कर दूसरा कोई भी उनसे द्वेष रखनेवाला नहीं है। संजय! मेरा पुत्र दुर्योधन कालके अधीन हो गया है; क्योंकि उसकी बुद्धि रागसे दूषित है। वह मूर्ख अत्यन्त तेजस्वी महात्मा पाण्डवोंके स्वत्वको दबा लेनेकी चेष्टा कर रहा है। केवल दुर्योधन और कर्ण ही सुख और प्रियजनोंसे बिछुड़े हुए महामना पाण्डवोंके मनमें क्रोध उत्पन्न करते रहते हैं ।। ६-७ ।।

उत्थानवीर्यः सुखमेधमानो दुर्योधनः सुकृतं मन्यते तत् । तेषां भागं यच्च मन्येत बालः

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