महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1579, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके भेदको तथा कार्यसहित प्रकृतिसे मुक्त होनेको जो पुरुष ज्ञाननेत्रोंद्वारा तत्त्वसे जानते हैं,<sup>३</sup> वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं ॥ ३४ ॥
इति श्रीमन्महाभारते भीष्मपर्वणि श्रीमद्भगवद्गीता पर्वणि श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥ भीष्मपर्वणि तु सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार श्रीमन्महाभारत भीष्मपर्वके श्रीमद्भगवद्गीता पर्वके अन्तर्गत ब्रह्मविद्या एवं योगशास्त्ररूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग नामक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥ भीष्मपर्वमें सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥
१. जैसे खेतमें बोये हुए बीजोंका उनके अनुरूप फल समयपर प्रकट होता है, वैसे ही इस शरीरमें बोये हुए कर्म-संस्काररूप बीजोंका फल भी समयपर प्रकट होता रहता है। इसके अतिरिक्त इसका प्रतिक्षण क्षय होता रहता है, इसलिये भी इसे ‘क्षेत्र’ कहते हैं और इसीलिये गीताके पंद्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें इसको ‘क्षर’ पुरुष कहा गया है।
२. इससे भगवान्ने अन्तरात्मा द्रष्टाका लक्ष्य करवाया है। मन, बुद्धि, इन्द्रिय, महाभूत और इन्द्रियोंके विषय आदि जितना भी ज्ञेय (जाननेमें आनेवाला) दृश्यवर्ग है—सब जड़, विनाशी, परिवर्तनशील है। चेतन आत्मा उस जड़ दृश्यवर्गसे सर्वथा विलक्षण है। यह उसका ज्ञाता है, उसमें अनुस्यूत है और उसका अधिपति है। इसीलिये इसे ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं। इसी ज्ञाता चेतन आत्माको गीताके सातवें अध्यायमें ‘परा प्रकृति’ (७।५), आठवेंमें ‘अध्यात्म’ (८।३) और पंद्रहवें अध्यायमें ‘अक्षर पुरुष’ (१५।१६) कहा गया है। यह आत्मतत्त्व बड़ा ही गहन है, इसीसे भगवान्ने भिन्न-भिन्न प्रकरणोंके द्वारा कहीं स्त्रीवाचक, कहीं नपुंसकवाचक और कहीं पुरुषवाचक नामसे इसका वर्णन किया है। वास्तवमें आत्मा विकारोंसे सर्वथा रहित, अलिंग, नित्य, निर्विकार एवं चेतन—ज्ञानस्वरूप है।
३. इससे ‘आत्मा’ और ‘परमात्मा’ की एकताका प्रतिपादन किया गया है। आत्मा और परमात्मामें वस्तुतः कुछ भी भेद नहीं है, प्रकृतिके संगसे भेद-सा प्रतीत होता है; इसीलिये गीताके दूसरे अध्यायके चौबीसवें और पचीसवें श्लोकोंमें आत्माके स्वरूपका वर्णन करते हुए जिन शब्दोंका प्रयोग किया है, बारहवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें निर्गुण-निराकार परमात्माके लक्षणोंका वर्णन करते समय भी प्रायः उन्हींके भावोंके द्योतक शब्दोंका प्रयोग किया गया है।
४. ‘यत्’ पदसे भगवान्ने क्षेत्रका स्वरूप बतलानेका संकेत किया है और उसे पाँचवें श्लोकमें बतलाया है।
५. ‘यादृक्’ पदसे क्षेत्रका स्वभाव बतलानेका संकेत किया है और उसका वर्णन छब्बीसवें और सत्ताईसवें श्लोकोंमें समस्त भूतोंको उत्पत्ति-विनाशशील बतलाकर किया है।
६. ‘यद्विकारि’ पदसे क्षेत्रके विकारोंका वर्णन करनेका संकेत किया है और उनका वर्णन छठे श्लोकमें किया है।
७. जिन पदार्थोंके समुदायका नाम ‘क्षेत्र’ है, उनमेंसे कौन पदार्थ किससे उत्पन्न हुआ—यह बतलानेका संकेत ‘यतश्च यत्’ पदोंसे किया है और उसका वर्णन उन्नीसवें श्लोकके उत्तरार्द्धमें तथा बीसवेंके पूर्वार्द्धमें किया गया है।
८. ‘सः’ पद ‘क्षेत्रज्ञ’ का वाचक है तथा ‘यः’ पदसे उसका स्वरूप बतलानेका संकेत किया गया है और आगे चलकर उसके प्रकृतिस्थ एवं वास्तविक दोनों स्वरूपोंका वर्णन किया गया है—जैसे उन्नीसवें श्लोकमें उसे ‘अनादि’ बीसवेंमें ‘सुख-दुःखोंका भोक्ता’ एवं इक्कीसवेंमें ‘अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म ग्रहण करनेवाला’ बतलाकर तो प्रकृतिस्थ पुरुषका स्वरूप बतलाया गया है और बाईसवेंमें तथा सत्ताईसवेंसे तीसवेंतक परमात्माके साथ एकता करके उसके वास्तविक स्वरूपका निरूपण किया गया है।
९. ‘यत्प्रभावः’ से क्षेत्रज्ञका प्रभाव बतलानेके लिये संकेत किया गया है और उसे इकतीसवेंसे तैंतीसवें श्लोकतक बतलाया गया है।
१. ‘विविधैः’ विशेषणके सहित ‘छन्दोभिः’ पद ऋक्, यजुः, साम और अथर्व—इन चारों वेदोंके ‘संहिता’ और ‘ब्राह्मण’ दोनों ही भागोंका वाचक है; समस्त उपनिषद् और भिन्न-भिन्न शाखाओंको भी इन्हींके अन्तर्गत समझ लेना