भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1581

९. अन्तःकरणमें जो ज्ञानशक्ति है, जिसके द्वारा प्राणी सुख-दुःख और समस्त पदार्थोंका अनुभव करते हैं, जिसे

गीताके दसवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें 'चेतना' कहा गया है-उसीका वाचक यहाँ 'चेतना' है, यह भी अन्तःकरणकी

वृत्तिविशेष है; अतएव इसकी भी गणना क्षेत्रके विकारोंमें की गयी है।

१०. गीताके अठारहवें अध्यायके तैंतीसवें, चौंतीसवें और पैंतीसवें श्लोकोंमें जिस धारणशक्तिके सात्त्विक, राजस और

तामस - तीन भेद किये गये हैं, उसीका वाचक यहाँ 'धृति' है। अन्तःकरणका विकार होनेसे इसकी गणना भी क्षेत्रके

विकारोंमें की गयी है।

११. यहाँतक विकारोंसहित क्षेत्रका संक्षेपसे वर्णन हो गया अर्थात् पाँचवें श्लोकमें क्षेत्रका स्वरूप संक्षेपमें बतला दिया

गया और छठेमें उसके विकारोंका वर्णन संक्षेपमें कर दिया गया।

१२. अपनेको श्रेष्ठ, सम्मान्य, पूज्य या बहुत बड़ा समझना एवं मान-बड़ाई, प्रतिष्ठा-पूजा आदिकी इच्छा करना अथवा

बिना ही इच्छा किये इन सबके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना-यह मानित्व है। इन सबका न होना ही 'अमानित्व' है।

१३. मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा और पूजाके लिये, धनादिके लोभसे या किसीको ठगने आदिके अभिप्रायसे अपनेको

धर्मात्मा, दानशील, भगवद्भक्त, ज्ञानी या महात्मा विख्यात करना और बिना ही हुए धर्मपालन, उदारता, दातापन, भक्ति,

योगसाधना, व्रत-उपवासादिका अथवा अन्य किसी भी प्रकारके गुणका ढोंग करना-दम्भित्व है। इसके सर्वथा अभावका

नाम 'अदम्भित्व' है।

१. किसी भी प्राणीको मन, वाणी या शरीरसे किसी प्रकार भी कभी कष्ट देना - मनसे किसीका बुरा चाहना, वाणीसे

किसीको गाली देना, कठोर वचन कहना, किसीकी निन्दा करना या अन्य किसी प्रकारके दुःखदायक और अहितकारक

वचन कह देना; शरीरसे किसीको मारना, कष्ट पहुँचाना या किसी प्रकारसे हानि पहुँचाना आदि जो हिंसाके भाव हैं, इन

सबके सर्वथा अभावका नाम 'अहिंसा' अर्थात् किसी भी प्राणीको किसी प्रकार भी न सताना है।

२. अपना अपराध करनेवालेके लिये किसी प्रकार भी दण्ड देनेका भाव मनमें न रखना, उससे बदला लेनेकी अथवा

अपराधके बदले उसे इस लोक या परलोकमें दण्ड मिले - ऐसी इच्छा न रखना और उसके अपराधोंको वस्तुतः अपराध

ही न मानकर उन्हें सर्वथा भुला देना 'क्षमाभाव' है। गीताके दसवें अध्यायके चौथे श्लोकमें इसकी कुछ विस्तारसे व्याख्या

की गयी है।

३. जिस साधकमें मन, वाणी और शरीरकी सरलताका भाव पूर्णरूपसे आ जाता है, वह सबके साथ सरलताका

व्यवहार करता है; उसमें कुटिलताका सर्वथा अभाव हो जाता है अर्थात् उसके व्यवहारमें दाव-पेंच, कपट या टेढ़ापन जरा

भी नहीं रहता; वह बाहर और भीतरसे सदा समान और सरल रहता है।

४. विद्या और सदुपदेश देनेवाले गुरुका नाम 'आचार्य' है। ऐसे गुरुके पास रहकर श्रद्धा-भक्तिपूर्वक मन, वाणी और

शरीरके द्वारा सब प्रकारसे उनको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करना, नमस्कार करना, उनकी आज्ञाओंका पालन करना और

उनके अनुकूल आचरण करना आदि 'आचार्योपासन' यानी गुरु-सेवा है।

५. सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहारसे द्रव्यकी शुद्धि होती है, उस द्रव्यसे उपार्जित अन्नसे आहारकी शुद्धि होती है।

यथायोग्य शुद्ध बर्तावसे आचरणोंकी शुद्धि होती है और जल-मिट्टी आदिके द्वारा प्रक्षालनादि क्रियासे शरीरकी शुद्धि होती

है। यह सब बाहरकी शुद्धि है। राग-द्वेष और छल-कपट आदि विकारोंका नाश होकर अन्तःकरणका स्वच्छ हो जाना

भीतरकी शुद्धि है। दोनों ही प्रकारकी शुद्धियोंको 'शौच' कहा जाता है।

६. बड़े-से-बड़े कष्ट, विपत्ति, भय या दुःखके आ पड़नेपर भी विचलित न होना एवं काम, क्रोध, भय या लोभ आदिसे

किसी प्रकार भी अपने धर्म और कर्तव्यसे जरा भी न डिगना तथा मन और बुद्धिमें किसी तरहकी चंचलताका न रहना

'अन्तःकरणकी स्थिरता' है।

७. यहाँ 'आत्मा' से अन्तःकरण और इन्द्रियोंके सहित शरीरको समझना चाहिये। अतः इन सबको भलीभाँति अपने

वशमें कर लेना ही इनका निग्रह करना है।

८. इस लोक और परलोकके जितने भी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धरूप विषय-पदार्थ हैं-अन्तःकरण और

इन्द्रियोंद्वारा जिनका भोग किया जाता है और अज्ञानके कारण जिनको मनुष्य सुखके हेतु समझता है, किंतु वास्तवमें जो

दुःखके कारण हैं- उन सबमें प्रीतिका सर्वथा अभाव हो जाना 'इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम्' है।

९. मन, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर - इन सबमें जो 'अहम्' बुद्धि हो रही है- अर्थात् अज्ञानके कारण जो इन

अनात्मवस्तुओंमें आत्मबुद्धि हो रही है-इस देहाभिमानका सर्वथा अभाव हो जाना 'अनहंकार' कहलाता है।

१०. जन्मका कष्ट सहज नहीं है; पहले तो असहाय जीवको माताके गर्भमें लंबे समयतक भाँति-भाँतिके क्लेश होते हैं,

फिर जन्मके समय योनिद्वारसे निकलनेमें असह्य यन्त्रणा भोगनी पड़ती है। नाना प्रकारकी योनियोंमें बार-बार जन्म ग्रहण

करनेमें ये जन्म-दुःख होते हैं। मृत्युकालमें भी महान् कष्ट होता है। जिस शरीर और घरमें आजीवन ममता रही, उसे बलात्