महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1627, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसम्बन्ध—इस प्रकार तीन तरहके यज्ञोंके लक्षण बतलाकर, अब तपके लक्षणोंका प्रकरण आरम्भ करते हुए चार श्लोकोंद्वारा सात्त्विक तपके लक्षण बतलाते हैं—
देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं^७ शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥ १४ ॥
देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनोंका पूजन, पवित्रता,^८ सरलता,^३ ब्रह्मचर्य^३ और अहिंसा^३—यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है^४ ॥ १४ ॥
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।^५
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥
जो उद्वेग न करनेवाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रोंके पठनका एवं परमेश्वरके नाम-जपका अभ्यास है, वही वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥
मनःप्रसादः^६ सौम्यत्वं^७ मौनमात्मविनिग्रहः^८ ^९ ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्^१० तपो मानसमुच्यते ॥ १६ ॥
मनकी प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करनेका स्वभाव, मनका निग्रह और अन्तःकरणके भावोंकी भलीभाँति पवित्रता—इस प्रकार यह मनसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥ १६ ॥
श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत् त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः^११ सात्त्विकं परिचक्षते ॥ १७ ॥
फलको न चाहनेवाले योगी पुरुषोंद्वारा परमश्रद्धासे किये हुए^१२ उस पूर्वोक्त तीन प्रकारके तपको सात्त्विक कहते हैं^१३ ॥ १७ ॥
सम्बन्ध—अब राजस तपके लक्षण बतलाये जाते हैं—
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन^१ चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्^२ ॥ १८ ॥
जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा अन्य किसी स्वार्थके लिये भी^३ स्वभावसे या पाखण्डसे किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है ॥ १८ ॥
सम्बन्ध—अब तामस तपके लक्षण बतलाते हैं, जो कि सर्वथा त्याज्य हैं—
मूढग्राहेणात्मनो^४ यत् पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत् तामसमुदाहृतम् ॥ १९ ॥