महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1642, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो कर्ता संगरहित, अहंकारके वचन न बोलनेवाला, धैर्य और उत्साहसे युक्त तथा कार्यके सिद्ध होने और न होनेमें हर्ष-शोकादि विकारोंसे रहित है, वह सात्त्विक कहा जाता है<sup>६</sup>॥ २६॥
रागी<sup>१</sup> कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो$^२^३$ हिंसात्मकोऽशुचिः$^४^५$ ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
जो कर्ता आसक्तिसे युक्त, कर्मोंके फलको चाहनेवाला और लोभी है तथा दूसरोंको कष्ट देनेके स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोकसे लिप्त है, वह राजस कहा गया है॥ २७॥
अयुक्तः<sup>६</sup> प्राकृतः<sup>७</sup> स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८ ॥
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षासे रहित, घमंडी<sup>८</sup>, धूर्त<sup>९</sup> और दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला<sup>१०</sup> तथा शोक करनेवाला आलसी<sup>११</sup> और दीर्घसूत्री<sup>१२</sup> है—वह तामस कहा जाता है<sup>१३</sup>॥ २८॥
**सम्बन्ध—**इस प्रकार तत्त्वज्ञानमें सहायक सात्त्विकभावको ग्रहण करानेके लिये और उसके विरोधी राजस-तामस भावोंका त्याग करानेके लिये कर्म-प्रेरणा और कर्म संग्रहमेंसे ज्ञान, कर्म और कर्ताके सात्त्विक आदि तीन-तीन भेद क्रमसे बतलाकर अब बुद्धि और धृतिके सात्त्विक, राजस और तामस—इस प्रकार त्रिविध भेद क्रमशः बतलानेकी प्रस्तावना करते हुए बतलाते हैं—
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥ २९ ॥
हे धनंजय! अब तू बुद्धिका और धृतिका भी गुणोंके अनुसार तीन प्रकारका भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णतासे विभागपूर्वक कहा जानेवाला सुन<sup>१</sup>॥ २९॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
हे पार्थ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग<sup>२</sup> और निवृत्तिमार्गको<sup>३</sup> कर्तव्य और अकर्तव्यको,<sup>४</sup> भय और अभयको<sup>५</sup> तथा बन्धन और मोक्षको<sup>६</sup> यथार्थ जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है॥ ३०॥
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥ ३१ ॥
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धिके द्वारा धर्म और अधर्मको<sup>७</sup> तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको<sup>१</sup> भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है<sup>२</sup>॥ ३१॥