महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 166, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिष्टान् कामान् भारत स्वस्तिकामः ॥ ५ ॥ 'सत्यव्रतका पालन करनेवाली वीरपत्नी द्रुपदकुमारी राजपुत्री मनस्विनी कृष्णा अपने पुत्रोंसहित कुशलपूर्वक है न? भारत! इनके सिवा आप जिन-जिनके कल्याणकी इच्छा रखते हैं तथा जिन अभीष्ट भोगोंको बनाये रखना चाहते हैं, वे आत्मीय जन तथा धन-वैभव-वाहन आदि भोगोपकरण सकुशल हैं न?' ॥ ५ ॥
युधिष्ठिर उवाच
गावलगणे संजय स्वागतं ते प्रीयामहे ते वयं दर्शनेन । अनामयं प्रतिजाने तवाहं सहानुजैः कुशली चास्मि विद्वन् ॥ ६ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**गवल्गणकुमार संजय! तुम्हारा स्वागत है। तुम्हें देखकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। विद्वन्! मैं अपने भाइयोंसहित कुशलसे हूँ तथा तुम्हें अपने आरोग्यकी सूचना दे रहा हूँ ॥ ६ ॥
चिरादिदं कुशलं भारतस्य श्रुत्वा राज्ञः कुरुवृद्धस्य सूत । मन्ये साक्षाद् दृष्टमहं नरेन्द्रं दृष्ट्वैव त्वां संजय प्रीतियोगात् ॥ ७ ॥ सूत! कुरुकुलके वृद्ध पुरुष भरतनन्दन महाराज धृतराष्ट्रका यह कुशल-समाचार दीर्घकालके बाद सुनकर और प्रेमपूर्वक तुम्हें भी देखकर मैं यह अनुभव करता हूँ कि आज मुझे साक्षात् महाराज धृतराष्ट्रका ही दर्शन हुआ है ॥ ७ ॥
पितामहो नः स्थविरो मनस्वी महाप्राज्ञः सर्वधर्मोपपन्नः । स कौरव्यः कुशली तात भीष्मो यथापूर्वं वृत्तिरस्त्यस्य कच्चित् ॥ ८ ॥ तात! मनस्वी, परम ज्ञानी तथा समस्त धर्मोंके ज्ञानसे सम्पन्न हमारे बूढ़े पितामह कुरुवंशी भीष्मजी तो कुशलसे हैं न? हमलोगोंपर उनका स्नेहभाव तो पूर्ववत् बना हुआ है न? ॥ ८ ॥
कच्चिद् राजा धृतराष्ट्रः सपुत्रो वैचित्रवीर्यः कुशली महात्मा । महाराजो बाह्लीकः प्रातिपेयः कच्चिद् विद्वान् कुशली सूतपुत्र ॥ ९ ॥