भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1680

तं प्रयान्तमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो धनंजयः । अवतीर्य रथात् तूर्णं भ्रातृभिः सहितोऽन्वयात् ॥ १४ ॥ वासुदेवश्च भगवान् पृष्ठतोऽनुजगाम तम् । तथा मुख्याश्च राजानस्तच्चित्ता जग्मुरुत्सुकाः ॥ १५ ॥ कुन्तीपुत्र धनंजय उन्हें शत्रु-सेनाकी ओर जाते देख तुरंत रथसे उतर पड़े और भाइयोंसहित उनके पीछे-पीछे जाने लगे। भगवान् श्रीकृष्ण भी उनके पीछे गये तथा उन्हींमें चित्त लगाये रहनेवाले प्रधान-प्रधान राजा भी उत्सुक होकर उनके साथ गये ॥ १४-१५ ॥

अर्जुन उवाच किं ते व्यवसितं राजन् यदस्मानपहाय वै । पद्भ्यामेव प्रयातोऽसि प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् ॥ १६ ॥ अर्जुनने पूछा—राजन्! आपने क्या निश्चय किया है कि हमलोगोंको छोड़कर आप पूर्वाभिमुख हो पैदल ही शत्रुसेनाकी ओर चल दिये हैं? ॥ १६ ॥

भीमसेन उवाच क्व गमिष्यसि राजेन्द्र निक्षिप्तकवचायुधः । दंशितेष्वरिसैन्येषु भ्रातृनुत्सृज्य पार्थिव ॥ १७ ॥ भीमसेनने पूछा—महाराज! पृथ्वीनाथ! कवच और आयुध नीचे डालकर भाइयोंको भी छोड़कर कवच आदिसे सुसज्जित हुई शत्रु-सेनामें कहाँ जायँगे? ॥ १७ ॥

नकुल उवाच एवं गते त्वयि ज्येष्ठे मम भ्रातरि भारत । भीर्मे दुनोति हृदयं ब्रूहि गन्ता भवान् क्व नु ॥ १८ ॥ नकुलने पूछा—भारत! आप मेरे बड़े भाई हैं। आपके इस प्रकार शत्रुसेनाकी ओर चल देनेपर भारी भय मेरे हृदयको पीड़ित कर रहा है। बताइये, आप कहाँ जायँगे? ॥ १८ ॥

सहदेव उवाच अस्मिन् रणसमूहे वै वर्तमाने महाभये । उत्सृज्य क्व नु गन्तासि शत्रूनभिमुखो नृप ॥ १९ ॥ सहदेवने पूछा—नरेश्वर! इस रणक्षेत्रमें जहाँ शत्रु-सेनाका समूह जुटा हुआ है और महान् भय उपस्थित है, आप हमें छोड़कर शत्रुओंकी ओर कहाँ जायँगे? ॥ १९ ॥

संजय उवाच एवमाभाष्यमाणोऽपि भ्रातृभिः कुरुनन्दनः ।