महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1686, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन् किमंत्र साह्यं ते करोमि कुरुनन्दन । कामं योत्स्ये परस्यार्थे ब्रूहि यत् ते विवक्षितम् ॥ ४४ ॥ भीष्म बोले— राजन्! कुरुनन्दन! मैं यहाँ तुम्हारी क्या सहायता करूँ? युद्ध तो मैं इच्छानुसार तुम्हारे शत्रुकी ओरसे ही करूँगा; अतः बताओ, तुम क्या कहना चाहते हो? ॥ ४४ ॥
युधिष्ठिर उवाच कथं जयेयं संग्रामे भवन्तमपराजितम् । एतन्मे मन्त्रय हितं यदि श्रेयः प्रपश्यसि ॥ ४५ ॥ युधिष्ठिर बोले— पितामह! आप तो किसीसे पराजित होनेवाले हैं नहीं, फिर मैं आपको युद्धमें कैसे जीत सकूँगा? यदि आप मेरा कल्याण देखते और सोचते हैं तो मेरे हितकी सलाह दीजिये ॥ ४५ ॥
भीष्म उवाच नैनं पश्यामि कौन्तेय यो मां युध्यन्तमाहवे । विजयेत पुमान् कश्चित् साक्षादपि शतक्रतुः ॥ ४६ ॥ भीष्मने कहा— कुन्तीनन्दन! मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो संग्रामभूमिमें युद्ध करते समय मुझे पराजित कर सके। युद्धकालमें कोई पुरुष, साक्षात् इन्द्र ही क्यों न हो, मुझे परास्त नहीं कर सकता ॥ ४६ ॥
युधिष्ठिर उवाच हन्त पृच्छामि तस्मात् त्वां पितामह नमोऽस्तु ते । वधोपायं ब्रवीहि त्वमात्मनः समरे परैः ॥ ४७ ॥ युधिष्ठिर बोले— पितामह! आपको नमस्कार है। इसलिये अब मैं आपसे पूछता हूँ, आप युद्धमें शत्रुओंद्वारा अपने मारे जानेका उपाय बताइये ॥ ४७ ॥
भीष्म उवाच न स्म तं तात पश्यामि समरे यो जयेत माम् । न तावन्मृत्युकालोऽपि पुनरागमनं कुरु ॥ ४८ ॥ भीष्म बोले— बेटा! जो समरभूमिमें मुझे जीत ले, ऐसे किसी वीरको मैं नहीं देखता हूँ। अभी मेरा मृत्युकाल भी नहीं आया है; अतः अपने इस प्रश्नका उत्तर लेनेके लिये फिर कभी आना ॥ ४८ ॥
संजय उवाच ततो युधिष्ठिरो वाक्यं भीष्मस्य कुरुनन्दन ।