महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1689, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयतो धर्मस्ततः कृष्णो यतः कृष्णस्ततो जयः ।
युद्ध्यस्व गच्छ कौन्तेय पृच्छ मां किं ब्रवीमि ते ।। ६० ।।
जहाँ धर्म है, वहाँ श्रीकृष्ण हैं और जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय है। कुन्तीकुमार! जाओ, युद्ध करो। और भी पूछो, तुम्हें क्या बताऊँ? ।। ६० ।।
युधिष्ठिर उवाच
पृच्छामि त्वां द्विजश्रेष्ठ शृणु यन्मेऽभिकाङ्क्षितम् ।
कथं जयेयं संग्रामे भवन्तमपराजितम् ।। ६१ ।।
युधिष्ठिर बोले— द्विजश्रेष्ठ! मैं आपसे पूछता हूँ। आप मेरे मनोवांछित प्रश्नको सुनिये। आप किसीसे भी परास्त होनेवाले नहीं हैं; फिर आपको मैं युद्धमें कैसे जीत सकूँगा? ।। ६१ ।।
द्रोण उवाच
न तेऽस्ति विजयस्तावद् यावद् युद्ध्याम्यहं रणे ।
ममाशु निधने राजन् यतस्व सह सोदरैः ।। ६२ ।।
द्रोणाचार्य बोले— राजन्! मैं जबतक समरभूमिमें युद्ध करूँगा, तबतक तुम्हारी विजय नहीं हो सकती। तुम अपने भाइयोंसहित ऐसा प्रयत्न करो, जिससे शीघ्र मेरी मृत्यु हो जाय ।। ६२ ।।
युधिष्ठिर उवाच
हन्त तस्मान्महाबाहो वधोपायं वदात्मनः ।
आचार्य प्रणिपत्यैष पृच्छामि त्वां नमोऽस्तु ते ।। ६३ ।।
युधिष्ठिर बोले— महाबाहु आचार्य! इसलिये अब आप अपने वधका उपाय मुझे बताइये। आपको नमस्कार है। मैं आपके चरणोंमें प्रणाम करके यह प्रश्न कर रहा हूँ ।। ६३ ।।
द्रोण उवाच
न शत्रुं तात पश्यामि यो मां हन्याद् रथे स्थितम् ।
युध्यमानं सुसंरब्धं शरवर्षौघवर्षिणम् ।। ६४ ।।
द्रोणाचार्य बोले— तात! जब मैं रथपर बैठकर कुपित हो बाणोंकी वर्षा करते हुए युद्धमें संलग्न रहूँ, उस समय जो मुझे मार सके, ऐसे किसी शत्रुको नहीं देख रहा हूँ ।। ६४ ।।
ऋते प्रायगतं राजन् न्यस्तशस्त्रमचेतनम् ।
हन्यान्मां युधि योधानां सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ६५ ।।