महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहो तो उस समय आपको उसका उत्साह नष्ट करना चाहिये। मामाजी! मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि उस युद्धमें दुर्योधन आप-जैसे शूरवीरको सूतपुत्रके सारथिका कार्य करनेके लिये अवश्य नियुक्त करेगा॥ ८६॥
शल्य उवाच सम्पत्स्यत्येष ते कामः कुन्तीपुत्र यथेप्सितम्। गच्छ युध्यस्व विश्रब्धः प्रतिजाने वचस्तव॥ ८७॥ **शल्य बोले—**कुन्तीनन्दन! तुम्हारा यह अभीष्ट मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। जाओ, निश्चिन्त होकर युद्ध करो। मैं तुम्हारे वचनका पालन करनेकी प्रतिज्ञा करता हूँ॥ ८७॥
संजय उवाच अनुमान्याथ कौन्तेयो मातुलं मद्रकेश्वरम्। निर्जगाम महासैन्याद् भ्रातृभिः परिवारितः॥ ८८॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार अपने मामा मद्रराज शल्यकी अनुमति लेकर भाइयोंसे घिरे हुए कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर उस विशाल सेनासे बाहर निकल गये॥ ८८॥
वासुदेवस्तु राधेयमाहवेऽभिजगाम वै। तत एनमुवाचेदं पाण्डवार्थे गदाग्रजः॥ ८९॥ इसी समय भगवान् श्रीकृष्ण उस युद्धमें राधानन्दन कर्णके पास गये। वहाँ जाकर उन गदाग्रजने पाण्डवोंके हितके लिये उससे इस प्रकार कहा—॥ ८९॥
श्रुतं मे कर्ण भीष्मस्य द्वेषात् किल न योत्स्यसे। अस्मान् वरय राधेय यावद् भीष्मो न हन्यते॥ ९०॥ 'कर्ण! मैंने सुना है, तुम भीष्मसे द्वेष होनेके कारण युद्ध नहीं करोगे। राधानन्दन! ऐसी दशामें जबतक भीष्म मारे नहीं जाते हैं, तबतक हमलोगोंका पक्ष ग्रहण कर लो॥ ९०॥
हते तु भीष्मे राधेय पुनरेष्यसि संयुगम्। धार्तराष्ट्रस्य साहाय्यं यदि पश्यसि चेत् समम्॥ ९१॥ 'राधेय! जब भीष्म मारे जायँ, उसके बाद तुम यदि ठीक समझो तो युद्धमें पुनः दुर्योधनकी सहायताके लिये चले आना'॥ ९१॥
कर्ण उवाच न विप्रियं करिष्यामि धार्तराष्ट्रस्य केशव। त्यक्तप्राणं हि मां विद्धि दुर्योधनहितैषिणम्॥ ९२॥ **कर्ण बोला—**केशव! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं दुर्योधनका हितैषी हूँ। उसके लिये अपने प्राणोंको निछावर किये बैठा हूँ; अतः मैं उसका अप्रिय कदापि नहीं करूँगा॥ ९२॥