महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1712, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशकुनिः प्रतिविन्ध्यं तु प्रतिविध्यन्तमाहवे । व्यदारयन्महाप्राज्ञः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ६५ ॥ युद्धमें अपनेको बेधनेवाले प्रतिविन्ध्यको भी परम बुद्धिमान् शकुनिने झुके हुए गाँठवाले बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ६५ ॥
सुदक्षिणं तु राजेन्द्र काम्बोजानां महारथम् । श्रुतकर्मा पराक्रान्तमभ्यद्रवत संयुगे ॥ ६६ ॥ राजेन्द्र! काम्बोजदेशके राजा पराक्रमी महारथी सुदक्षिणपर रणभूमिमें श्रुतकर्माने आक्रमण किया ॥ ६६ ॥
सुदक्षिणस्तु समरे साहदेविं महारथम् । विद्ध्वा नाकम्पयत वै मैनाकमिव पर्वतम् ॥ ६७ ॥ तब सुदक्षिणने समरांगणमें सहदेवपुत्र महारथी श्रुतकर्माको क्षत-विक्षत कर दिया; तो भी वह उन्हें कम्पित न कर सका। वे मैनाक पर्वतकी भाँति अविचल भावसे खड़े रहे ॥ ६७ ॥
श्रुतकर्मा ततः क्रुद्धः काम्बोजानां महारथम् । शरैर्बहुभिरानर्च्छद् दारयन्निव सर्वशः ॥ ६८ ॥ तदनन्तर श्रुतकर्माने कुपित होकर महारथी काम्बोजराजको सब ओरसे विदीर्ण-सा करते हुए अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा भलीभाँति पीड़ित किया ॥ ६८ ॥
इरावानथ संक्रुद्धः श्रुतायुषमरिंदमम् । प्रत्युद्ययौ रणे यत्तो यत्तरूपं परंतपः ॥ ६९ ॥ दूसरी ओर शत्रुओंको संताप देनेवाले यत्नशील इरावान्ने युद्धमें कुपित होकर शत्रुदमन श्रुतायुषपर धावा किया। श्रुतायुष भी प्रयत्नपूर्वक उनका सामना कर रहा था ॥ ६९ ॥
आर्जुनिस्तस्य समरे हयान् हत्वा महारथः । ननाद बलवन्नादं तत् सैन्यं प्रत्यपूरयत् ॥ ७० ॥ अर्जुनके उस महारथी पुत्र इरावान्ने रणक्षेत्रमें श्रुतायुषके घोड़ोंको मारकर बड़े जोरसे गर्जना की और उसकी सेनाको बाणोंसे आच्छादित कर दिया ॥ ७० ॥
श्रुतायुस्तु ततः क्रुद्धः फाल्गुनेः समरे हयान् । निजघान गदाग्रेण ततो युद्धमवर्तत ॥ ७१ ॥ यह देख श्रुतायुषने भी रुष्ट होकर रणभूमिमें अर्जुनपुत्र इरावान्के घोड़ोंको अपनी गदाकी चोटसे मार डाला। तत्पश्चात् उन दोनोंमें खूब जमकर युद्ध होने लगा ॥ ७१ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ कुन्तिभोजं महारथम् । ससेनं ससुतं वीरं संससज्जतुराहवे ॥ ७२ ॥