भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1745

देवदूतका कहा हुआ यह वचन सुनकर भीष्मजीका मन प्रसन्न हो गया और उन्होंने श्वेतके वधका विचार किया ।। ९८ १/२ ।। विरथं रथिनां श्रेष्ठं श्वेतं दृष्ट्वा पदातिनम् ।। ९९ ।। सहितास्त्वभ्यवर्तन्त परीप्सन्तो महारथाः । रथियोंमें श्रेष्ठ श्वेतको रथहीन और पैदल देख उसकी रक्षा करनेके लिये एक साथ बहुत-से महारथी दौड़े आये ।। ९९ १/२ ।। सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। १०० ।। कैकेयो धृष्टकेतुश्च अभिमन्युश्च वीर्यवान् । उनके नाम इस प्रकार हैं—सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, केकयराजकुमार, धृष्टकेतु तथा पराक्रमी अभिमन्यु ।। १०० १/२ ।। एतानापततः सर्वान् द्रोणशल्यकृपैः सह ।। १०१ ।। अवारयदमेयात्मा वारिवेगानिवाचलः । इन सबको आते देख अमेय शक्तिसम्पन्न भीष्मजीने द्रोणाचार्य, शल्य तथा कृपाचार्यके साथ जाकर उनकी गति रोक दी, मानो किसी पर्वतने जलके प्रवाहको अवरुद्ध कर दिया हो ।। १०१ १/२ ।। स निरुद्धेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।। १०२ ।। श्वेतः खड्गमथाकृष्य भीष्मस्य धनुरच्छिनत् । समस्त महामना पाण्डवोंके अवरुद्ध हो जानेपर श्वेतने तलवार खींचकर भीष्मका धनुष काट दिया ।। १०२ १/२ ।। तदपास्य धनुश्छिन्नं त्वरमाणः पितामहः ।। १०३ ।। देवदूतवचः श्रुत्वा वधे तस्य मनो दधे । उस कटे हुए धनुषको फेंककर पितामह भीष्मने देवदूतके कथनपर ध्यान देकर तुरंत ही श्वेतके वधका निश्चय किया ।। १०३ १/२ ।। ततः प्रचरमाणस्तु पिता देवव्रतस्तव ।। १०४ ।। अन्यत् कार्मुकमादाय त्वरमाणो महारथः । क्षणेन सज्यमकरोच्छक्रचापसमप्रभम् ।। १०५ ।। तदनन्तर आपके पिता महारथी देवव्रतने तुरंत ही दूसरा धनुष लेकर वहाँ विचरण करते हुए ही क्षणभरमें उसपर प्रत्यंचा चढ़ा दी। वह इन्द्रधनुषके समान प्रकाशित हो रहा था ।। १०४-१०५ ।। पिता ते भरतश्रेष्ठ श्वेतं दृष्ट्वा महारथैः । वृतं तं मनुजव्याघ्रैर्भीमसेनपुरोगमैः ।। १०६ ।। अभ्यवर्तत गाङ्गेयः श्वेतं सेनापतिं द्रुतम् ।