भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1753, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1753

तथा रुक्मरथो राजन् पुत्रः शल्यस्य मानितः ।। ३० ।। विन्दानुविन्दावावन्त्यौ काम्बोजश्च सुदक्षिणः । बृहत्क्षत्रस्य दायादः सैन्धवश्च जयद्रथः ।। ३१ ।। राजन्! उन रथियोंके नाम ये हैं—कोसलनरेश बृहद्बल, मगधदेशीय जयत्सेन, शल्यके प्रतापी पुत्र रुक्मरथ, अवन्ति-के राजकुमार विन्द और अनुविन्द, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा बृहत्क्षत्रके पुत्र सिन्धुराज जयद्रथ ।। ३०-३१ ।। नानाधातुविचित्राणि कार्मुकाणि महात्मनाम् । विस्फारितान्यदृश्यन्त तोयदेष्विव विद्युतस् ।। ३२ ।। इन महामना वीरोंके फैलाये हुए अनेक रूप-रंगके विचित्र धनुष बादलोंमें बिजलियोंके समान दृष्टिगोचर हो रहे थे ।। ३२ ।। ते तु बाणमयं वर्षं शङ्खमूर्ध्नि न्यपातयन् । निदाघान्तेऽनिलोद्भूता मेघा इव नगे जलम् ।। ३३ ।। उन सबने शंखके मस्तकपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, मानो ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें वायुद्वारा उठाये हुए मेघ पर्वतपर जल बरसा रहे हों ।। ३३ ।। ततः क्रुद्धो महेष्वासः सप्तभल्लैः सुतेजनैः । धनूंषि तेषामाच्छिद्य ननर्द पृतनापतिः ।। ३४ ।। उस समय महान् धनुर्धर सेनापति शंखने कुपित होकर तेज किये हुए भल्ल नामक सात बाणोंद्वारा उन सातों रथियोंके धनुष काटकर गर्जना की ।। ३४ ।। ततो भीष्मो महाबाहुर्विर्नद्य जलदो यथा । तालमात्रं धनुर्गृह्य शङ्खमभ्यद्रवद् रणे ।। ३५ ।। तदनन्तर महाबाहु भीष्मने मेघके समान गर्जना करके चार हाथ लंबा धनुष लेकर रणभूमिमें शंखपर धावा किया ।। ३५ ।। तमुद्यन्तमुदीक्ष्याथ महेष्वासं महाबलम् । संत्रस्ता पाण्डवी सेना वातवेगहतेव नौः ।। ३६ ।। उस समय महाधनुर्धर महाबली भीष्मको युद्धके लिये उद्यत देख पाण्डवसेना वायुके वेगसे डगमग होनेवाली नौकाकी भाँति काँपने लगी ।। ३६ ।। ततोऽर्जुनः संत्वरितः शङ्खस्यासीत् पुरःसरः । भीष्माद् रक्ष्योऽयमद्येति ततो युद्धमवर्तत ।। ३७ ।। यह देख अर्जुन तुरंत ही शंखके आगे आ गये। उनके आगे आनेका उद्देश्य यह था कि आज भीष्मके हाथसे शंखको बचाना चाहिये। फिर तो महान् युद्ध आरम्भ हुआ ।। ३७ ।। हाहाकारो महानासीद् योधानां युधि युध्यताम् । तेजस्तेजसि सम्पृक्तमित्येवं विस्मयं ययुः ।। ३८ ।।

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