महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1775, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअशीत्या निशितैर्बाणैस्ततोऽक्रोशन्त तावकाः ।
राजन्! तब रथियोंमें श्रेष्ठ भीष्मने पाण्डुनन्दन अर्जुनको अस्सी पैने बाण मारकर बींध डाला। यह देखकर आपके सैनिक हर्षसे कोलाहल करने लगे ।। ३१ १/२ ।।
तेषां तु निनदं श्रुत्वा सहितानां प्रहृष्टवत् ।। ३२ ।।
प्रविवेश ततो मध्यं नरसिंहः प्रतापवान् ।
तेषां महारथानां स मध्यं प्राप्य धनंजयः ।। ३३ ।।
चिक्रीड धनुषा राजँल्लक्ष्यं कृत्वा महारथान् ।
ततो दुर्योधनो राजा भीष्ममाह जनेश्वरः ।। ३४ ।।
पीड्यमानं स्वकं सैन्यं दृष्ट्वा पार्थेन संयुगे ।
उन समस्त कौरवोंका हर्षनाद सुनकर प्रतापी पुरुषसिंह अर्जुनने उनकी सेनाके भीतर प्रवेश किया। राजन्! उन महारथियोंके भीतर पहुँचकर अर्जुन उन सबको अपने बाणोंका निशाना बनाकर धनुषसे खेल करने लगे। तब प्रजापालक राजा दुर्योधनने अर्जुनके द्वारा युद्धमें अपनी सेनाको पीड़ित हुई देख भीष्मसे कहा— ।। ३२-३४ १/२ ।।
एष पाण्डुसुतस्तात कृष्णेन सहितो बली ।। ३५ ।।
यततां सर्वसैन्यानां मूलं नः परिकृन्तति ।
त्वयि जीवति गाङ्गेय द्रोणे च रथिनां वरे ।। ३६ ।।
‘तात! ये पाण्डुके बलवान् पुत्र अर्जुन श्रीकृष्णके साथ आकर समस्त सैन्योंके प्रयत्नशील होनेपर भी हमलोगोंका मूलोच्छेद कर रहे हैं। गंगानन्दन! आपके तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यके जीते-जी हमारे सैनिक मारे जा रहे हैं ।। ३५-३६ ।।
त्वत्कृते चैव कर्णोऽपि न्यस्तशस्त्रो विशाम्पते ।
न युध्यति रणे पार्थ हितकामः सदा मम ।। ३७ ।।
स तथा कुरु गाङ्गेय यथा हन्येत फाल्गुनः ।
‘प्रजानाथ! आपहीके कारण कर्णने भी हथियार डाल दिया है और वह रणभूमिमें अर्जुनसे युद्ध नहीं कर रहा है। कर्ण मेरा सदा हित चाहनेवाला है। गंगानन्दन! आप ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे अर्जुन मार डाले जायँ’ ।। ३७ १/२ ।।
एवमुक्तस्ततो राजन् पिता देवव्रतस्तव ।। ३८ ।।
धिक् क्षात्रं धर्ममित्युक्त्वा प्रायात् पार्थरथं प्रति ।
राजन्! दुर्योधनके ऐसा कहनेपर आपके पितृ-तुल्य भीष्म ‘क्षत्रिय-धर्मको धिक्कार है’ ऐसा कहकर अर्जुनके रथकी ओर चले ।। ३८ १/२ ।।
उभौ श्वेतहयौ राजन् संसक्तौ प्रेक्ष्य पार्थिवाः ।। ३९ ।।
सिंहनादान् भृशं चक्रुः शङ्खान् दध्मुश्च मारिष ।
महाराज! उन दोनोंके रथोंमें श्वेत घोड़े जुते हुए थे। आर्य! उन्हें एक-दूसरेसे भिड़े हुए देख सब राजा जोर-जोरसे सिंहनाद करने और शंख फूँकने लगे ।। ३९ १/२ ।।