महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 178, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंरणे विजेतुं विषहेत राजन् राधेयगुप्तान् सह भूमिपालैः ॥ ११ ॥ राजन्! इसी प्रकार द्रोणाचार्य, भीष्म, अश्वत्थामा, शल्य, कृपाचार्य आदि वीरों तथा अन्य राजाओंसहित कर्णके द्वारा सुरक्षित कौरवोंको युद्धमें जीतनेका साहस कौन कर सकता है? ॥ ११ ॥
महद् बलं धार्तराष्ट्रस्य राज्ञः को वै शक्तो हन्तुमक्षीयमाणः । सोऽहं जये चैव पराजये च निःश्रेयसं नाधिगच्छामि किञ्चित् ॥ १२ ॥ राजा दुर्योधनके पास विशाल वाहिनी एकत्र हो गयी है। कौन ऐसा वीर है जो स्वयं क्षीण न होकर उस सेनाका विनाश कर सके? मैं तो इस युद्धमें किसी भी पक्षकी जय हो या पराजय, कोई कल्याणकी बात नहीं देखता हूँ ॥ १२ ॥
कथं हि नीचा इव दुष्कुलेया निर्धर्मार्थं कर्म कुर्युश्च पार्थाः । सोऽहं प्रसाद्य प्रणतो वासुदेवं पञ्चालानामिधिपं चैव वृद्धम् ॥ १३ ॥ कृताञ्जलिः शरणं वः प्रपद्ये कथं स्वस्ति स्यात् कुरुसृंजयानाम् । न ह्येवमेवं वचनं वासुदेवो धनंजयो वा जातु किंचिन्न कुर्यात् ॥ १४ ॥ भला! कुन्तीके पुत्र नीच कुलमें उत्पन्न हुए दूसरे अधम मनुष्योंके समान ऐसा (निन्दित) कर्म कैसे कर सकते हैं? जिससे न तो धर्मकी सिद्धि होनेवाली है और न अर्थकी ही। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण हैं तथा वृद्ध पांचालराज द्रुपद भी उपस्थित हैं। मैं इन सबको प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ, हाथ जोड़कर आपलोगोंकी शरणमें आया हूँ। आप स्वयं विचार करें कि कुरु तथा सृंजय-वंशका कल्याण कैसे हो? मुझे विश्वास है कि भगवान् श्रीकृष्ण अथवा अर्जुन इस प्रकार प्रार्थनापूर्वक कही हुई मेरी किसी भी बातको ठुकरा नहीं सकते ॥ १३-१४ ॥
प्राणान् दद्याद् याचमानः कुतोऽन्य- देतद् विद्वन् साधनार्थं ब्रवीमि । एतद् राज्ञो भीष्मपुरोगमस्य मतं यद् वः शान्तिरिहोत्तमा स्यात् ॥ १५ ॥ इतना ही नहीं, मेरे माँगनेपर अर्जुन अपने प्राणतक दे सकते हैं, फिर दूसरी किसी वस्तुके लिये तो कहना ही क्या है? विद्वान् राजा युधिष्ठिर! मैं संधि-कार्यकी सिद्धिके लिये