महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1788, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब राजा केतुमान्के साथ क्रोधमें भरा हुआ श्रुतायु भी रणक्षेत्रमें भीमसेनके सामने आया। उस समय चेदि-देशीय सैनिकोंकी सेनाएँ व्यूहबद्ध होकर खड़ी थीं ॥ ६ ॥
रथैरनेकसाहस्रैः कलिङ्गानां नराधिप । अयुतेन गजानां च निषादैः सह केतुमान् ॥ ७ ॥ भीमसेनं रणे राजन् समन्तात् पर्यवारयत् । नरेश्वर! कलिंगोंके कई सहस्र रथ और दस हजार हाथियों एवं निषादोंके साथ केतुमान् उस रणस्थलमें भीमसेनको सब ओरसे रोकने लगा ॥ ७ १/२ ॥
चेदिमत्स्यकरूषाश्च भीमसेनपदानुगाः ॥ ८ ॥ अभ्यधावन्त समरे निषादान् सह राजभिः । ततः प्रवृत्ते युद्धं घोररूपं भयावहम् ॥ ९ ॥ तब भीमसेनके पदचिह्नोंपर चलनेवाले चेदि, मत्स्य तथा करूषदेशके क्षत्रियोंने समरभूमिमें निषादों एवं उनके राजाओंपर आक्रमण किया। फिर तो दोनों दलोंमें अत्यन्त घोर और भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ८-९ ॥
न प्राजानन्त योधाः स्वान् परस्परजिघांसया । घोरमासीत् ततो युद्धं भीमस्य सहसा परैः ॥ १० ॥ यथेन्द्रस्य महाराज महत्या दैत्यसेनया । महाराज! उस समय एक-दूसरोंको मार डालनेकी इच्छा रखकर सब योद्धा अपने और परायेकी पहचान नहीं कर पाते थे। शत्रुओंके साथ भीमसेनका वह युद्ध सहसा उसी प्रकार अत्यन्त भयंकर हो चला, जैसे विशाल दैत्य-सेनाके साथ देवराज इन्द्रका युद्ध हुआ करता है ॥ १० १/२ ॥
तस्य सैन्यस्य संग्रामे युध्यमानस्य भारत ॥ ११ ॥ बभूव सुमहान् शब्दः सागरस्येव गर्जतः । भरतनन्दन! संग्रामभूमिमें युद्ध करती हुई उस कलिंग-सेनाका महान् कोलाहल समुद्रकी गर्जनाके समान जान पड़ता था ॥ ११ १/२ ॥
अन्योन्यं स्म तदा योधा विकर्षन्तो विशाम्पते ॥ १२ ॥ महीं चक्रुश्चितां सर्वां शशलोहितसंनिभाम् । राजन्! उस समय सब योद्धाओंने छिन्न-भिन्न होकर परस्पर एक-दूसरेको खींचते हुए वहाँकी सारी भूमिको अपनी रक्तरंजित लाशोंसे पाट दिया। वह भूमि खरगोशके रक्तकी भाँति लाल दिखायी देने लगी ॥ १२ १/२ ॥
योधांश्च स्वान् परान् वापि नाभ्यजानञ्जिघांसया ॥ १३ ॥ स्वानप्याददते स्वांश्च शूराः परमदुर्जयाः ।