महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1801, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभीष्मके उस सुवर्णभूषित रथपर सात्यकि, भीमसेन तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने एक साथ ही धावा किया ॥ १०७ ॥ परिवार्य तु ते सर्वे गाङ्गेयं तरसा रणे । त्रिभिस्त्रिभिः शरैर्घोरैर्भीष्ममानर्च्छुरोजसा ॥ १०८ ॥ उन सब लोगोंने रणक्षेत्रमें गंगानन्दन भीष्मको वेगपूर्वक घेरकर तीन-तीन भयंकर बाणोंद्वारा उन्हें यथाशक्ति पीड़ा पहुँचायी ॥ १०८ ॥ प्रत्यविध्यत तान् सर्वान् पिता देवव्रतस्तव । यतमानान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ॥ १०९ ॥ उस समय आपके पितृतुल्य भीष्मने वहाँ युद्धके लिये प्रयत्न करनेवाले उन सभी महाधनुर्धर योद्धाओं-को सीधे जानेवाले तीन-तीन बाणोंसे बींधकर बदला चुकाया ॥ १०९ ॥ ततः शरसहस्रेण संनिवार्य महारथान् । हयान् काञ्चनसंनाहान् भीमस्य न्यहनच्छरैः ॥ ११० ॥ तदनन्तर सहस्रों बाणोंकी वर्षा करके उन तीनों महारथियोंको रोककर सोनेके साज-बाज धारण करनेवाले भीमसेनके घोड़ोंको भीष्मने अपने बाणोंसे मार डाला ॥ ११० ॥ हताश्वे स रथे तिष्ठन् भीमसेनः प्रतापवान् । शक्तिं चिक्षेप तरसा गाङ्गेयस्य रथं प्रति ॥ १११ ॥ अश्वोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर खड़े हुए प्रतापी भीमसेनने भीष्मजीके रथपर बड़े वेगसे शक्ति चलायी ॥ १११ ॥ अप्राप्तामथ तां शक्तिं पिता देवव्रतस्तव । त्रिधा चिच्छेद समरे सा पृथिव्यामशीर्यत ॥ ११२ ॥ वह शक्ति अभी पासतक पहुँची ही न थी कि आपके पितृतुल्य भीष्मने समरभूमिमें उसके तीन टुकड़े कर डाले और वह भूतलपर बिखर गयी ॥ ११२ ॥ ततः शैक्यायसीं गुर्वीं प्रगृह्य बलवान् गदाम् । भीमसेनस्ततस्तूर्णं पुप्लुवे मनुजर्षभ ॥ ११३ ॥ नरश्रेष्ठ! तब बलवान् भीमसेन पूर्णतः लोहेके सारतत्त्व (फौलाद)-की बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर तुरंत उस रथसे कूद पड़े ॥ ११३ ॥ सात्यकोऽपि ततस्तूर्णं भीमस्य प्रियकाम्यया । गाङ्गेयसारथिं तूर्णं पातयामास सायकैः ॥ ११४ ॥ इधर सात्यकिने भी भीमसेनका प्रिय करनेकी इच्छासे भीष्मके सारथिको तुरंत ही अपने सायकोंद्वारा मार गिराया ॥ ११४ ॥ भीष्मस्तु निहते तस्मिन् सारथौ रथिनां वरः । वातायमानैस्तैरश्वैरपनीतो रणाजिरात् ॥ ११५ ॥