महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1805, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब अश्वत्थामाने शीघ्र ही एक बाणसे अभिमन्युको घायल कर दिया। तत्पश्चात् शल्यने दस और कृपाचार्यने तीन पैने बाण उसे मारे ॥ ७ ॥ लक्ष्मणस्तव पौत्रस्तु सौभद्रं समवस्थितम् । अभ्यवर्तत संहृष्टस्ततो युद्धमवर्तत ॥ ८ ॥ तदनन्तर आपके पौत्र लक्ष्मणने सुभद्राकुमार अभिमन्युको सामने खड़ा देख हर्ष और उत्साहमें भरकर उसपर आक्रमण किया। फिर तो दोनोंमें युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ८ ॥ दौर्योधनिः सुसंक्रुद्धः सौभद्रं परवीरहा । विव्याध समरे राजंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ९ ॥ राजन्! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्योधनके पुत्र लक्ष्मणने अत्यन्त कुपित हो समरभूमिमें (अनेक बाणोंसे) अभिमन्युको बींध डाला। वह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ९ ॥ अभिमन्युः सुसंक्रुद्धो भ्रातरं भरतर्षभ । शरैः पञ्चाशता राजन् क्षिप्रहस्तोऽभ्यविध्यत ॥ १० ॥ महाराज! भरतश्रेष्ठ! यह देख शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाला वीर अभिमन्यु अत्यन्त कुपित हो उठा और अपने भाई लक्ष्मणको उसने पचास बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १० ॥ लक्ष्मणोऽपि पुनस्तस्य धनुश्छिच्छेद पत्रिणा । मुष्टिदेशे महाराज ततस्ते चुक्रुशुर्जनाः ॥ ११॥ राजन्! तब लक्ष्मणने भी पुनः एक बाण मारकर उसके धनुषको, जहाँ मुट्ठी रखी जाती है, वहींसे काट दिया। यह देख आपके सैनिक हर्षसे कोलाहल कर उठे ॥ तद् विहाय धनुश्छिन्नं सौभद्रः परवीरहा । अन्यदादत्तवांश्चित्रं कार्मुकं वेगवत्तरम् ॥ १२ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले सुभद्राकुमारने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा विचित्र धनुष हाथमें लिया, जो अत्यन्त वेगशाली था ॥ १२ ॥ तौ तत्र समरे युक्तौ कृतप्रतिकृतैषिणौ । अन्योन्यं विशिखैस्तीक्ष्णैरर्जघ्नतुः पुरुषर्षभौ ॥ १३ ॥ वे दोनों पुरुषरत्न वहाँ एक-दूसरेके अस्त्रोंका निवारण अथवा प्रतीकार करनेकी इच्छा रखकर युद्धमें संलग्न थे और पैने बाणोंद्वारा एक-दूसरेको घायल कर रहे थे ॥ १३ ॥ ततो दुर्योधनो राजा दृष्ट्वा पुत्रं महारथम् । पीडितं तव पौत्रेण प्रायात् तत्र प्रजेश्वरः ॥ १४ ॥ तब प्रजाजनोंका स्वामी राजा दुर्योधन अपने महारथी पुत्रको आपके पौत्र अभिमन्युसे पीड़ित देख वहाँ स्वयं जा पहुँचा ॥ १४ ॥ संनिवृत्ते तव सुते सर्व एव जनाधिपाः । आर्जुनिं रथवंशेन समन्तात् पर्यवारयन् ॥ १५ ॥