भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1807, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1807

उस रणभूमिमें कितने ही रथ टूट गये, बहुतेरे हाथी नष्ट हो गये, कितने ही रथियोंके घोड़े मार डाले गये और कितने ही रथ-यूथपतियोंके रथ भागते दिखायी दिये ॥ २३ ॥ विरथा रथिनश्चान्ये धावमानाः समन्ततः । तत्र तत्रैव दृश्यन्ते सायुधाः साङ्गदैर्भुजैः ॥ २४ ॥ अन्यान्य बहुत-से रथी रथहीन होकर अंगदभूषित भुजाओंमें आयुध धारण किये जहाँ-तहाँ चारों ओर दौड़ते देखे जाते थे ॥ २४ ॥ हयारोहा हयांस्त्यक्त्वा गजारोहाश्च दन्तिनः । अर्जुनस्य भयाद् राजन् समन्ताद् विप्रदुद्रुवुः ॥ २५ ॥ महाराज! अर्जुनके भयसे घुड़सवार घोड़ोंको और हाथीसवार हाथियोंको छोड़कर सब ओर भाग चले ॥ २५ ॥ रथेभ्यश्च गजेभ्यश्च हयेभ्यश्च नराधिपाः । पतिताः पात्यमानाश्च दृश्यन्तेऽर्जुनसायकैः ॥ २६ ॥ वहाँ बहुत-से नरेश अर्जुनके सायकोंसे कटकर रथों, हाथियों और घोड़ोंसे गिरे और गिराये जाते हुए दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ २६ ॥ सगदानुद्यतान् बाहून् सखड्गांश्च विशाम्पते । सप्रासांश्च सतूणीरान् सशरान् सशरासनान् ॥ २७ ॥ साङ्कुशान् सप‍ताकांश्च तत्र तत्रार्जुनो नृणाम् । निचकर्त शरैरुग्रै रौद्रं वपुर्धारयन् ॥ २८ ॥ प्रजानाथ! अर्जुनने उस रणक्षेत्रमें अत्यन्त भयंकर रूप धारण किया था। उन्होंने अपने उग्र बाणोंद्वारा योद्धाओंकी ऊपर उठी हुई भुजाओंको, जिनमें गदा, खड्ग, प्रास, तूणीर, धनुष-बाण, अंकुश और ध्वजा-पताका आदि शोभा पा रहे थे, काट गिराया ॥ २७-२८ ॥ परिघाणां प्रदीप्तानां मुद्गराणां च मारिष । प्रासानां भिन्दिपालानां निस्त्रिंशानां च संयुगे ॥ २९ ॥ परश्वधानां तीक्ष्णानां तोमराणां च भारत । वर्मणां चापविद्धानां काञ्चनानां च भूमिप ॥ ३० ॥ ध्वजानां चर्मणां चैव व्यजनानां च सर्वशः । छत्राणां हेमदण्डानां तोमराणां च भारत ॥ ३१ ॥ प्रतोदानां च योक्त्राणां कशानां चैव मारिष । राशयः स्मात्र दृश्यन्ते विनिकीर्णा रणक्षितौ ॥ ३२ ॥ आर्य! भरतनन्दन! भूपाल! उस रणभूमिमें गिरे हुए उद्दीप्त परिघ, मुद्गर, प्रास, भिन्दिपाल, खड्ग, फरसे, तीखे तोमर, सुवर्णमय कवच, ध्वज, ढाल, सोनेके डंडोंसे विभूषित छत्र, व्यजन, चाबुक, जोते, कोड़े और अंकुश ढेर-के-ढेर बिखरे दिखायी देते थे ॥ २९—३२ ॥