भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1809, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1809

श्रान्ता भीताश्च नो योधा न योत्स्यन्ति कथंचन ॥ ४१ ॥ ‘अतः नरश्रेष्ठ! मैं इस समय समस्त सैनिकोंको युद्धसे हटा लेना ही उचित समझता हूँ। हमारे सभी योद्धा थके-माँदे और डरे हुए हैं; अतः इस समय किसी तरह युद्ध नहीं कर सकेंगे' ॥ ४१ ॥

एवमुक्त्वा ततो भीष्मो द्रोणमाचार्यसत्तमम् । अवहारमथो चक्रे तावकानां महारथः ॥ ४२ ॥ आचार्यप्रवर द्रोणसे ऐसा कहकर महारथी भीष्मने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धभूमिसे लौटा लिया ॥ ४२ ॥

(ततः सरथनागाश्च जयं प्राप्य ससोमकाः । पञ्चालाः पाण्डवाश्चैव प्रणेदुश्च पुनः पुनः ॥ प्रययुः शिबिरायैव धनंजयपुरस्कृताः । वादित्रघोषैः संहृष्टाः प्रनृत्यन्तो महारथाः ॥) तदनन्तर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित सोमक, पांचाल तथा पाण्डववीर विजय पाकर बारंबार सिंहनाद करने लगे। वे सभी महारथी विजयसूचक वाद्योंकी ध्वनिके साथ अत्यन्त हर्षमें भरकर नाचने लगे और अर्जुनको आगे करके शिविरकी ओर चल दिये।

ततोऽवहारः सैन्यानां तव तेषां च भारत । अस्तं गच्छति सूर्येऽभूत् संध्याकाले च वर्तति ॥ ४३ ॥ भारत! इस प्रकार सूर्यके अस्ताचलको चले जानेपर संध्याके समय आपकी और पाण्डवोंकी सेनाएँ लौट आयीं ॥ ४३ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि द्वितीययुद्धदिवसावहारे पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें द्वितीय युद्धदिवसमें सेनाको लौटानेसे सम्बन्ध रखनेवाला पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४५ श्लोक हैं।]