महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1811, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंशूरसेनदेशके योद्धा उस महाव्यूहके पुच्छ भागमें खड़े हुए ॥ ६-७ ॥ मागधाश्च कलिङ्गाश्च दासेरकगणैः सह । दक्षिणं पक्षमासाद्य स्थिता व्यूहस्य दंशिताः ॥ ८ ॥ मगध और कलिंगदेशके योद्धा दासेरकगणोंके साथ कवच धारण करके व्यूहके दायें पंखके स्थानमें स्थित हुए ॥ ८ ॥ कारूषाश्च विकुञ्जाश्च मुण्डाः कुण्डीवृषास्तथा । बृहद्बलेन सहिता वामं पार्श्वमवस्थिताः ॥ ९ ॥ कारूष, विकुंज, मुण्ड और कुण्डीवृष आदि योद्धा राजा बृहद्बलके साथ बायें पंखके स्थानमें खड़े हुए ॥ व्यूढं दृष्ट्वा तु तत् सैन्यं सव्यसाची परंतपः । धृष्टद्युम्नेन सहितः प्रत्यव्यूहत संयुगे ॥ १० ॥ अर्धचन्द्रेण व्यूहेन व्यूहं तमतिदारुणम् । दक्षिणं शृङ्गमस्थाय भीमसेनो व्यरोचत ॥ ११ ॥ शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने कौरव-सेनाकी वह व्यूह-रचना देखकर युद्धभूमिमें उसका सामना करनेके लिये धृष्टद्युम्नको साथ लेकर अपनी सेनाका अत्यन्त भयंकर अर्धचन्द्राकार व्यूह बनाया। उसके दक्षिण शिखरपर भीमसेन सुशोभित हुए ॥ १०-११ ॥ नानाशस्त्रौघसम्पन्नैर्नानादेश्यैर्नृपैर्वृतः । तदन्वेव विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ १२ ॥ उनके साथ नाना प्रकारके शस्त्रसमुदायोंसे सम्पन्न विभिन्न देशोंके नरेश भी थे। भीमसेनके पीछे ही राजा विराट और महारथी द्रुपद खड़े हुए ॥ १२ ॥ तदनन्तरमेवासीन्नीलो नीलायुधैः सह । नीलादनन्तरश्चैव धृष्टकेतुर्महाबलः ॥ १३ ॥ उनके बाद नील आयुधधारी सैनिकोंके साथ राजा नील और नीलके बाद महाबली धृष्टकेतु खड़े हुए ॥ १३ ॥ चेदिकाशिकरूषैश्च पौरवैरपि संवृतः । धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च पञ्चालाश्च प्रभद्रकाः ॥ १४ ॥ मध्ये सैन्यस्य महतः स्थिता युद्धाय भारत । तत्रैव धर्मराजोऽपि गजानीकेन संवृतः ॥ १५ ॥ भारत! धृष्टकेतुके साथ चेदि, काशी, करूष और पौरव आदि देशोंके सैनिक भी थे। धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा पांचाल और प्रभद्रकगण उस विशाल सेनाके मध्यभागमें युद्धके लिये खड़े हुए। हाथियोंकी सेनासे घिरे हुए धर्मराज युधिष्ठिर भी वहीं थे ॥ १४-१५ ॥ ततस्तु सात्यकी राजन् द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।