भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1817

पत्तिसङ्घा हयारोहैः सादिसङ्घाश्च पत्तिभिः । पात्यमाना व्यदृश्यन्त शतशोऽथ सहस्रशः ॥ २३ ॥ घुड़सवारोंद्वारा पैदलोंके समूह और पैदलोंद्वारा घुड़सवारोंके समूह सैकड़ों और हजारोंकी संख्यामें गिराये जाते हुए दिखायी देते थे ॥ २३ ॥ ध्वजैस्तत्रापविद्धैश्च कार्मुकैस्तोमरैस्तथा । प्रासैस्तथा गदाभिश्च परिघैः कम्पनैस्तथा ॥ २४ ॥ शक्तिभिः कवचैश्चित्रैः कणपैरङ्कुशैरपि । निस्त्रिंशैर्विमलैश्चापि स्वर्णपुङ्खैः शरैस्तथा ॥ २५ ॥ परस्तोमैः कुथाभिश्च कम्बलैश्च महाधनैः । भूर्भाति भरतश्रेष्ठ स्रग्दामैरिव चित्रिता ॥ २६ ॥ भरतश्रेष्ठ! वहाँ इधर-उधर गिरे हुए ध्वज, धनुष, तोमर, प्रास, गदा, परिघ, कम्पन, शक्ति, विचित्र कवच, कणप, अंकुश, चमचमाते हुए खड्ग, सुवर्णमय पाँखवाले बाण, शूल, गद्दी और बहुमूल्य कम्बलोंद्वारा आच्छादित हुई वहाँकी भूमि भाँति-भाँतिके पुष्पहारोंसे चित्रित हुई-सी जान पड़ती थी ॥ २४—२६ ॥ नराश्वकायैः पतितैर्दन्तिभिश्च महाहवे । अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥ २७ ॥ उस महासमरमें मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशें पड़ी हुई थीं। मांस और रक्तकी कीचड़ जम गयी थी। वहाँकी भूमिमें जाना असम्भव हो गया था ॥ २७ ॥ प्रशशाम रजो भौमं व्युक्षितं रणशोणितैः । दिशश्च विमलाः सर्वाः सम्बभूवुर्जनेश्वर ॥ २८ ॥ जनेश्वर! रणभूमिमें बहे हुए रक्तसे सिंचकर धरतीकी धूल बैठ गयी और सारी दिशाएँ साफ हो गयीं ॥ उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः । चिह्नभूतानि जगतो विनाशार्थाय भारत ॥ २९ ॥ भारत! उस समय जगत्‌के विनाशको सूचित करनेवाले असंख्य कबन्ध चारों ओर उठने लगे ॥ २९ ॥ तस्मिन् युद्धे महारौद्रे वर्तमाने सुदारुणे । प्रत्यदृश्यन्त रथिनो धावमानाः समन्ततः ॥ ३० ॥ उस अत्यन्त दारुण और महाभयंकर युद्धमें रथी योद्धा चारों ओर दौड़ते दिखायी देते थे ॥ ३० ॥ ततो भीष्मश्च द्रोणश्च सैन्धवश्च जयद्रथः । पुरुमित्रो जयो भोजः शल्यश्चापि ससौबलः ॥ ३१ ॥ एते समरदुर्धर्षाः सिंहतुल्यपराक्रमाः ।