महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1821, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्र सौबलकाः क्रुद्धा वार्ष्णेयस्य रथोत्तमम् । तिलशश्चिच्छिदुः क्रोधाच्छस्त्रैर्नानाविधैर्युधि ॥ ८ ॥ वहाँ जाते ही क्रोधमें भरे हुए सुबलपुत्रोंने युद्ध-स्थलमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा सात्यकिके श्रेष्ठ रथको रोषपूर्वक तिल-तिल करके काट डाला ॥ ८ ॥
सात्यकिस्तु रथं त्यक्त्वा वर्तमाने भयावहे । अभिमन्यो रथं तूर्णमारुरोह परंतपः ॥ ९ ॥ तब शत्रुओंको संताप देनेवाले सात्यकि उस समय छिड़े हुए भयंकर संग्राममें अपने टूटे हुए रथको त्यागकर तुरंत ही अभिमन्युके रथपर जा बैठे ॥ ९ ॥
तावेकरथसंयुक्तौ सौबलेयस्य वाहिनीम् । व्यधमेतां शितैस्तूर्णं शरैः संनतपर्वभिः ॥ १० ॥ फिर एक ही रथपर बैठे हुए वे दोनों वीर झुकी हुई गाँठवाले पैने बाणोंसे तुरंत ही सुबलपुत्र शकुनिकी सेनाका संहार करने लगे ॥ १० ॥
द्रोणभीष्मौ रणे यत्तौ धर्मराजस्य वाहिनीम् । नाशयेतां शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ॥ ११ ॥ इसी प्रकार एक ओरसे आकर युद्धके लिये सदा उद्यत रहनेवाले द्रोणाचार्य और भीष्मने कंकपक्षीके पंखोंसे युक्त तीखे बाणोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरकी सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया ॥ ११ ॥
ततो धर्मसुतो राजा माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । मिषतां सर्वसैन्यानां द्रोणानीकमुपादद्रवन् ॥ १२ ॥ तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर तथा माद्रीकुमार पाण्डुनन्दन नकुल-सहदेवने समस्त सेनाओंके देखते-देखते द्रोणाचार्यकी सेनापर धावा किया ॥ १२ ॥
तत्रासीत् सुमहद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् । यथा देवासुरं युद्धं पूर्वमासीत् सुदारुणम् ॥ १३ ॥ जैसे पूर्वकालमें अत्यन्त भयंकर देवासुर-संग्राम हुआ था, उसी प्रकार वहाँ अत्यन्त भयानक रोमांचकारी युद्ध होने लगा ॥ १३ ॥
कुर्वाणौ सुमहत् कर्म भीमसेनघटोत्कचौ । (दुर्योधनस्य महतीं द्रावयामास वाहिनीम् ।) दुर्योधनस्ततोऽभ्येत्य तावुभावप्यवारयत् ॥ १४ ॥ दूसरी ओर भीमसेनने और घटोत्कचने महान् पराक्रमका परिचय देते हुए दुर्योधनकी विशाल वाहिनीको खदेड़ना आरम्भ किया। उस समय दुर्योधनने सामने आकर उन दोनोंको रोक दिया ॥ १४ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम हैडिम्बस्य पराक्रमम् । अतीत्य पितरं युद्धे यदयुध्यत भारत ॥ १५ ॥