महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1824, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुनरावर्ततां तेषां वेग आसीद् विशाम्पते । पूर्वतः सागरस्येव चन्द्रस्योदयनं प्रति ।। ३२ ।। महाराज! पुनः लौटते हुए उन योद्धाओंका महान् वेग चन्द्रोदयके समय बढ़ते हुए महासागरके समान जान पड़ता था ।। ३२ ।। संनिवृत्तांस्ततस्तांस्तु दृष्ट्वा राजा सुयोधनः । अब्रवीत् त्वरितो गत्वा भीष्मं शान्तनवं वचः ।। ३३ ।। तब उन सबको लौटा हुआ देख राजा दुर्योधन तुरंत ही शान्तनुनन्दन भीष्मके पास जाकर बोला— ।। ३३ ।।
पितामह निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि भारत । नानुरूपमहं मन्ये त्वयि जीवति कौरव ।। ३४ ।। द्रोणे चास्त्रविदां श्रेष्ठे सपुत्रे ससुहृज्जने । कृपे चैव महेष्वासे द्रवते यद् वरूथिनी ।। ३५ ।। ‘पितामह भरतनन्दन! मैं आपसे जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनिये। कुरुनन्दन! आपके, अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यके और महाधनुर्धर कृपाचार्यके पुत्रों और सुहृदोंसहित जीते-जी जो मेरी सेना भाग रही है, इसे मैं आपलोगोंके योग्य नहीं मानता हूँ ।। ३४-३५ ।। न पाण्डवान् प्रतिबलांस्तव मन्ये कथंचन । तथा द्रोणस्य संग्रामे द्रौणेश्चैव कृपस्य च ।। ३६ ।।