भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1847

विष्टभ्य गात्राणि निपेतुरुर्व्याम्। ऐन्द्रेण तेनास्त्रवरेण राजन् महाहवे भिन्नतनुत्रदेहाः ॥ १२३ ॥ युद्धके मुहानेपर जिनके यन्त्र कट गये और इन्द्रकील नष्ट हो गये थे, ऐसे बड़े-बड़े ध्वज छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे। उस संग्राममें अर्जुनके बाणोंसे घायल पैदलोंके समूह, रथी, घोड़े और हाथी शीघ्र ही सत्त्वशून्य होकर अपने अंगोंको पकड़े हुए पृथ्वीपर गिरने लगे। राजन्! उस महान् ऐन्द्रास्त्रसे समरभूमिमें सभी सैनिकोंके शरीर और कवच छिन्न-भिन्न हो गये ॥ १२२-१२३ ॥

ततः शरौघैर्निशितैः किरीटिना नृदेहशस्त्रक्षतलोहितोदा । नदी सुघोरा नरमेदफेना प्रवर्तिता तत्र रणाजिरे वै ॥ १२४ ॥ उस समय समरांगणमें किरीटधारी अर्जुनने अपने तीखे बाणसमूहोंद्वारा योद्धाओंके शरीरमें लगे हुए आघातसे निकलनेवाले रक्तकी एक भयंकर नदी बहा दी; जिसमें मनुष्योंके मेदे फेनके समान जान पड़ते थे ॥ १२४ ॥

वेगेन सातीव पृथुप्रवाहा परेतनागाश्वशरीररोधा । नरेन्द्रमज्जोच्छितमांसपङ्का प्रभूतरक्षोगणभूतसेविता ॥ १२५ ॥ वह नदी बड़े वेगसे बह रही थी। उसका प्रवाह पुष्ट था। मरे हुए हाथी, घोड़ोंके शरीर तटोंके समान प्रतीत होते थे। राजाओंके मज्जा और मांस कीचड़के समान थे। बहुत-से राक्षस और भूतगण उसका सेवन करते थे ॥ १२५ ॥

शिरःकपालाकुलकेशशाद्वला शरीरसङ्घातसहस्रवाहिनी । विशीर्णनानाकवचोर्मिसंकुला नराश्वनागास्थिनिकृत्तशर्करा ॥ १२६ ॥ मुर्दोंकी खोपड़ियोंके केश सेवारका भ्रम उत्पन्न करते थे। सहस्रों शरीर उसमें जल-जन्तुओंके समान बह रहे थे। छिन्न-भिन्न होकर बिखरे हुए कवच लहरोंके समान उसमें सर्वत्र व्याप्त थे। मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंकी कटी हुई हड्डियाँ छोटे-छोटे कंकड़-पत्थरोंका काम दे रही थीं ॥ १२६ ॥

श्वकङ्कशालावृकगृध्रकाकैः क्रव्यादसङ्घैश्च तरक्षुभिश्च । उपेत्तकूलां ददृशुर्मनुष्याः