महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1849, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंविभावसोर्लोहितरागयुक्ताम् । तदनन्तर शस्त्रोंके आघातसे अत्यन्त क्षत-विक्षत अंगोंवाले भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, बाह्निक तथा अन्य कौरवयोध्दाओंने सूर्यदेवको अपनी किरणोंको समेटते देख और उस भयंकर ऐन्द्रास्त्रको प्रलयंकर अग्निके समान सर्वत्र व्याप्त एवं असह्य हुआ जानकर सूर्यकी लालीसे युक्त संध्या एवं निशाके आरम्भकालका अवलोकन कर सेनाको युद्धभूमिसे लौटा लिया ॥ १३१-१३२ ½ ॥
अवाप्य कीर्तिं च यशश्च लोके विजित्य शत्रूंश्च धनंजयोऽपि ॥ १३३ ॥ ययौ नरेन्द्रैः सह सोदरैश्च समाप्तकर्मा शिविरं निशायाम् । धनंजय भी शत्रुओंको जीतकर एवं लोकमें सुयश और सुकीर्ति पाकर भाइयों तथा राजाओंके साथ सारा कार्य समाप्त करके निशाके आरम्भमें अपने शिविरको लौट गये ॥ १३३ ½ ॥
ततः प्रजज्ञे तुमुलः कुरूणां निशामुखे घोरतमः प्रणादः ॥ १३४ ॥ रणे रथानामयुतं निहत्य हता गजाः सप्तशताऽर्जुनेन । प्राच्याश्च सौवीरगणाश्च सर्वे निपातिताः क्षुद्रकमालवाश्च ॥ १३५ ॥ महत् कृतं कर्म धनंजयेन कर्तुं यथा नार्हति कश्चिदन्यः । उस समय रात्रिके आरम्भमें कौरवोंके दलमें बड़ा भयंकर कोलाहल होने लगा। वे आपसमें कहने लगे—‘आज अर्जुनने रणक्षेत्रमें दस हजार रथियोंका विनाश करके सात सौ हाथी मार डाले हैं। प्राच्य, सौवीर, क्षुद्रक और मालव सभी क्षत्रियगणोंको मार गिराया है। धनंजयने जो महान् पराक्रम किया है, उसे दूसरा कोई वीर नहीं कर सकता’ ॥ १३४-१३५ ½ ॥
श्रुतायुरम्बष्ठपतिश्च राजा तथैव दुर्मर्षणचित्रसेनौ ॥ १३६ ॥ द्रोणः कृपः सैन्धवबाह्लिकौ च भूरिश्रवाः शल्यशलौ च राजन् । अन्ये च योधाः शतशः समेताः क्रुद्धेन पार्थेन रणस्य मध्ये ॥ १३७ ॥ स्वबाहुवीर्येण जिताः सभीष्माः