भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1856

महारथियोंपर धावा किया ॥ २३ ॥ तेषां महास्त्राणि महारथाना- मसह्यकर्मा विनिहत्य कार्ष्णिः । बभौ महामन्त्रहुतार्चिमाली सदोगतः सन् भगवानिवाग्निः ॥ २४ ॥ अर्जुनकुमारका पराक्रम दूसरोंके लिये असह्य था। वह उन कौरव महारथियोंके बड़े-बड़े अस्त्रोंको नष्ट करके यज्ञ-मण्डपमें महान् मन्त्रोंद्वारा हविष्यकी आहुति पाकर प्रज्वलित हुई ज्वालामालाओंसे अलंकृत भगवान् अग्निदेवके समान शोभा पाने लगा ॥ २४ ॥ ततः स तूर्णं रुधिरोदफेनां कृत्वा नदीमाशु रणे रिपूणाम् । जगाम सौभद्रमतीत्य भीष्मो महारथं पार्थमदीनसत्त्वः ॥ २५ ॥ तदनन्तर उदार शक्तिशाली भीष्मने रणभूमिमें तुरंत ही शत्रुओंके रक्तरूपी जल एवं फेनसे भरी नदी बहाकर सुभद्राकुमार अभिमन्युको टालकर महारथी अर्जुनपर आक्रमण किया ॥ २५ ॥ ततः प्रहस्याद्भुतविक्रमेण गाण्डीवमुक्तेन शिलाशितेन । विपाठजालेन महास्त्रजालं विनाशयामास किरीटमाली ॥ २६ ॥ तब किरीटधारी अर्जुनने हँसकर अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए गाण्डीव धनुषसे छोड़े और शिलापर रगड़कर तेज किये हुए विपाठ नामक बाणोंके समूहसे शत्रुओंके बड़े-बड़े अस्त्रोंके जालको छिन्न-भिन्न कर दिया ॥ २६ ॥ तमुत्तमं सर्वधनुर्धराणा- मसक्तकर्मा कपिराजकेतुः । भीष्मं महात्माभिववर्ष तूर्णं शरौघजालैर्विमलैश्च भल्लैः ॥ २७ ॥ तत्पश्चात् अप्रतिहत पराक्रमवाले महामना कपि-ध्वज अर्जुनने सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ भीष्मपर तुरंत ही निर्मल भल्लों तथा बाणसमूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ २७ ॥ तथैव भीष्माहतमन्तरिक्षे महास्त्रजालं कपिराजकेतोः । विशीर्यमाणं ददृशुस्त्वदीया दिवाकरेणेव तमोऽभिभूतम् ॥ २८ ॥