महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1859, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंसमरभूमिमें शत्रुओंके साथ युद्ध करते हुए अभिमन्युका विशाल धनुष अस्त्रलाघवके पथपर स्थित हो सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ ७ ॥ स द्रौणिमिषुणैकेन विद्ध्वा शल्यं च पञ्चभिः । ध्वजं सांयमनेश्चैव सोऽष्टाभिश्चिच्छिदे ततः ॥ ८ ॥ उसने अश्वत्थामाको एक और शल्यको पाँच बाणोंसे घायल करके शलके ध्वजको आठ बाणोंसे काट डाला ॥ ८ ॥ रुक्मदण्डां महाशक्तिं प्रेषितां सौमदत्तिना । शितेनोरगसंकाशां पत्रिणापजहार ताम् ॥ ९ ॥ फिर भूरिश्रवाकी चलायी हुई स्वर्णदण्डविभूषित सर्पसदृश महाशक्तिको तीखे बाणसे छिन्न-भिन्न कर डाला ॥ ९ ॥ शल्यस्य च महावेगानस्यतः समरे शरान् । (धनुश्चिच्छेद भल्लेन तीव्रवेगेन फाल्गुनिः ।) निवार्यार्जुनदायादो जघान चतुरो हयान् ॥ १० ॥ शल्य समरभूमिमें बड़े वेगशाली बाणोंका प्रहार कर रहे थे; किंतु अर्जुनपुत्र अभिमन्युने तीव्र वेगवाले भल्लसे उनके धनुषके टुकड़े-टुकड़े कर दिये और उनकी प्रगतिको रोककर पार्थकुमारने चारों घोड़ोंको मार गिराया ॥ १० ॥ भूरिश्रवाश्च शल्यश्च द्रौणिः सांयमनिः शलः । नाभ्यवर्तन्त संरब्धाः कार्ष्णेर्बाहुबलोदयम् ॥ ११ ॥ भूरिश्रवा, शल्य, अश्वत्थामा तथा सांयमनि (सोमदत्तपुत्र) शल—ये सब लोग अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए थे, तथापि अभिमन्युके बाहुबलकी वृद्धिको रोक न सके ॥ ११ ॥ ततस्त्रिगर्ता राजेन्द्र मद्रैश्च सह केकयैः । पञ्चविंशतिसाहस्रास्तव पुत्रेण चोदिताः ॥ १२ ॥ धनुर्वेदविदो मुख्या अजेयाः शत्रुभिर्युधि । सहपुत्रं जिघांसन्तं परिवव्रुः किरीटिनम् ॥ १३ ॥ राजेन्द्र! तब आपके पुत्र दुर्योधनसे प्रेरित होकर त्रिगतों तथा केकयोंसहित मद्रदेशके पचीस हजार योद्धाओंने शत्रुवधकी इच्छा रखनेवाले पुत्रसहित किरीटधारी अर्जुनको घेर लिया। वे सब-के-सब धनुर्वेदके प्रधान ज्ञाता और युद्धस्थलमें शत्रुओंके लिये अजेय थे ॥ १२-१३ ॥ तौ तु तत्र पितापुत्रौ परिक्षिप्तौ महारथौ । ददर्श राजन् पाञ्चाल्यः सेनापतिररिंदम ॥ १४ ॥ स वारणरथौघानां सहस्रैर्बहुभिर्वृतः । वाजिभिः पत्तिभिश्चैव वृतः शतसहस्रशः ॥ १५ ॥ धनुर्विस्फार्य संक्रुद्धो नोदयित्वा च वाहिनीम् ।