महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1861, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! तत्पश्चात् उन्होंने शीघ्र ही पचीस बाणोंसे शलपुत्रको घायल कर दिया तथा उसके घोड़ों एवं दोनों पृष्ठरक्षकोंको भी मृत्युके मुखमें डाल दिया ॥ २३ ॥ स हताश्वे रथे तिष्ठन् ददर्श भरतर्षभ । पुत्रः सांयमनेः पुत्रं पाञ्चाल्यस्य महात्मनः ॥ २४ ॥ भरतश्रेष्ठ! जिसके घोड़े मार दिये गये थे, उसी रथपर खड़े हुए शलके पुत्रने महामना धृष्टद्युम्नके पुत्रको देखा ॥ २४ ॥ स प्रगृह्य महाघोरं निस्त्रिंशवरमायसम् । पदातिस्तूर्णमानर्च्छद् रथस्थं पुरुषर्षभः ॥ २५ ॥ तब पुरुषश्रेष्ठ शलपुत्र तुरंत ही एक अत्यन्त भयंकर लोहेकी बनी हुई बड़ी तलवार हाथमें ले पैदल ही रथपर बैठे हुए पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नकी ओर चला ॥ २५ ॥ तं महौघमिवायान्तं खात् पतन्तमिवोरगम् । भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् ॥ २६ ॥ दीप्यमानमिवादित्यं मत्तवारणविक्रमम् । अपश्यन् पाण्डवास्तत्र धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २७ ॥ उस युद्धमें पाण्डवों तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने मतवाले गजराजके समान पराक्रमी और सूर्यके समान दीप्तिमान् शलपुत्रको आते देखा। वह महान् वेगशाली जलप्रवाह, आकाशसे गिरते हुए सर्प तथा कालकी भेजी हुई मृत्युके समान जान पड़ता था। उसके हाथमें नंगी तलवार थी ॥ २६-२७ ॥ तस्य पाञ्चालदायादः प्रतीपमभिधावतः । शितनिस्त्रिंशहस्तस्य शरावरणधारिणः ॥ २८ ॥ बाणवेगमतीतस्य तथाभ्याशमुपेयुषः । त्वरन् सेनापतिः क्रुद्धो बिभेद गदया शिरः ॥ २९ ॥ वह विरोधभाव लेकर धावा कर रहा था। उसके हाथमें तीखी तलवार थी। उसने अपने अंगोंमें कवच धारण कर रखा था। वह बाणके वेगको लाँघकर अत्यन्त निकट आ पहुँचा था। उस दशामें पांचालराजकुमार सेनापति धृष्टद्युम्नने तुरंत क्रोधपूर्वक गदासे आघात करके उसके मस्तकको विदीर्ण कर दिया ॥ २८-२९ ॥ तस्य राजन् सनिस्त्रिंशं सुप्रभं च शरावरम् । हतस्य पततो हस्ताद् वेगेन न्यपतद् भुवि ॥ ३० ॥ राजन्! उसके मारे जानेपर शरीरसे चमकीला कवच और हाथसे तलवार उसके गिरनेके साथ ही वेगपूर्वक पृथ्वीपर गिरी ॥ ३० ॥ तं निहत्य गदाग्रेण स लेभे परमां मुदम् । पुत्रः पाञ्चालराजस्य महात्मा भीमविक्रमः ॥ ३१ ॥