महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1888, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उस दिन दिनभर घटोत्कचको आगे करके कौरवों और पाण्डवोंका युद्ध चलता रहा ॥ ८० ॥
कौरवास्तु ततो राजन् प्रययुः शिविरं स्वकम् । व्रीडमाना निशाकाले पाण्डवेयैः पराजिताः ॥ ८१ ॥ राजन्! तदनन्तर निशाके प्रारम्भकालमें पाण्डवोंसे पराजित होकर कौरव लज्जित हो अपने शिविरको गये ॥
शरविक्षतगात्रास्तु पाण्डुपुत्रा महारथाः । युद्धे सुमनसो भूत्वा जग्मुः स्वशिविरं प्रति ॥ ८२ ॥ महारथी पाण्डवोंके शरीर भी युद्धमें बाणोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे, तथापि वे प्रसन्नचित्त होकर अपने शिविरको लौटे ॥ ८२ ॥
पुरस्कृत्य महाराज भीमसेनघटोत्कचौ । पूजयन्तस्तदान्योन्यं मुदा परमया युताः ॥ ८३ ॥ नदन्तो विविधान् नादांस्तूर्यस्वनविमिश्रितान् । सिंहनादांश्च कुर्वन्तो विमिश्रान् शङ्खनिःस्वनैः ॥ ८४ ॥ महाराज! भीमसेन और घटोत्कचको आगे करके परस्पर एक दूसरेकी प्रशंसा करते हुए पाण्डवसैनिक बड़ी प्रसन्नताके साथ नाना प्रकारके सिंहनाद करते हुए गये। उनकी उस गर्जनाके साथ विविध वाद्योंकी ध्वनि तथा शंखोंके शब्द भी मिले हुए थे ॥ ८३-८४ ॥
विनदन्तो महात्मानः कम्पयन्तश्च मेदिनीम् । घट्टयन्तश्च मर्माणि तव पुत्रस्य मारिष ॥ ८५ ॥ प्रयाताः शिबिरायैव निशाकाले परंतप । शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रेष्ठ नरेश! महात्मा पाण्डव गर्जते, पृथ्वीको कँपाते और आपके पुत्रके मर्मस्थानोंपर चोट पहुँचाते हुए निशाकालमें शिविरको ही लौट गये ॥ ८५ १/२ ॥
दुर्योधनस्तु नृपतिर्दीनो भ्रातृवधेन च ॥ ८६ ॥ मुहूर्तं चिन्तयामास बाष्पशोकसमाकुलः । अपने भाइयोंके मारे जानेसे राजा दुर्योधन अत्यन्त दीन हो रहा था। वह नेत्रोंसे आँसू बहाता हुआ शोकसे व्याकुल हो दो घड़ीतक भारी चिन्तामें पड़ा रहा ॥ ८६ १/२ ॥
ततः कृत्वा विधिं सर्वं शिविरस्य यथाविधि । प्रदध्यौ शोकसंतप्तो भ्रातृव्यसनकर्शितः ॥ ८७ ॥ वह शिविरकी यथायोग्य सारी आवश्यक व्यवस्था करके भाइयोंके मारे जानेसे दुःखी एवं शोकसंतप्त हो चिन्तामें डूब गया ॥ ८७ ॥