भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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पृष्ठ 1891

यथावध्याः पाण्डुसुता यथा वध्याश्च मे सुताः ।। ७ ।। एतन्मे सर्वमाचक्ष्व याथातथ्येन संजय । दैववश मेरे ही ऊपर अत्यन्त भयंकर दण्ड पड़ रहा है। संजय! क्यों पाण्डव अवध्य हैं और क्यों मेरे पुत्र मारे जा रहे हैं? यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताओ ।। न हि पारं प्रपश्यामि दुःखस्यास्य कथंचन ।। ८ ।। समुद्रस्येव महतो भुजाभ्यां प्रतरन् नरः । जैसे अपनी भुजाओंसे तैरनेवाला मनुष्य महासागरका पार नहीं पा सकता, उसी प्रकार मैं इस दुःखका अन्त किसी प्रकार नहीं देखता हूँ ।। ८ १/२ ।। पुत्राणां व्यसनं मन्ये ध्रुवं प्राप्तं सुदारुणम् ।। ९ ।। घातयिष्यति मे सर्वान् पुत्रान् भीमो न संशयः । निश्चय ही मेरे पुत्रोंपर अत्यन्त भयंकर संकट प्राप्त हो गया है। मेरा विश्वास है कि भीमसेन मेरे सभी पुत्रोंको मार डालेंगे, इसमें संशय नहीं है ।। ९ १/२ ।। न हि पश्यामि तं वीरं यो मे रक्षेत् सुतान् रणे ।। १० ।। ध्रुवं विनाशः सम्प्राप्तः पुत्राणां मम संजय । मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो रणक्षेत्रमें मेरे पुत्रोंकी रक्षा कर सके। संजय! अवश्य ही मेरे पुत्रोंके विनाशकी घड़ी आ पहुँची है ।। १० १/२ ।। तस्मान्मे कारणं सूत शक्तिं चैव विशेषतः ।। ११ ।। पृच्छतो वै यथातत्त्वं सर्वमाख्यातुमर्हसि । अतः सूत! मैं तुमसे शक्ति³ और कारणके³ विषयमें जो विशेष प्रश्न कर रहा हूँ, वह सब यथार्थरूपसे बताओ ।। दुर्योधनश्च यच्चक्रे दृष्ट्वा स्वान् विमुखान् रणे ।। १२ ।। भीष्मद्रोणौ कृपश्चैव सौबलश्च जयद्रथः । द्रौणिर्वापि महेष्वासो विकर्णो वा महाबलः ।। १३ ।। निश्चयो वापि कस्तेषां तदा ह्यासीन्महात्मनाम् । विमुखेषु महाप्राज्ञ मम पुत्रेषु संजय ।। १४ ।। युद्धमें अपने सैनिकोंको विमुख हुआ देख दुर्योधनने क्या किया? भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, शकुनि, जयद्रथ, महाधनुर्धर अश्वत्थामा और महाबली विकर्णने भी क्या किया? महाप्राज्ञ संजय! मेरे पुत्रोंके विमुख होनेपर उन महामना महारथियोंने उस समय क्या निश्चय किया? ।। १२—१४ ।।

संजय उवाच

शृणु राजन्नवहितः श्रुत्वा चैवावधारय । नैव मन्त्रकृतं किंचिन्नैव मायां तथाविधाम् ।। १५ ।।