महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1902, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंको न्वयं यो भगवता प्रणम्य विनयाद् विभो । वाग्भिः स्तुतो वरिष्ठाभिः श्रोतुमिच्छाम तं वयम् ॥ ४ ॥ 'प्रभो! आपने विनयपूर्वक प्रणाम करके श्रेष्ठ वचनोंद्वारा जिनकी स्तुति की है, ये कौन थे? हम उनके विषयमें सुनना चाहते हैं' ॥ ४ ॥
एवमुक्तस्तु भगवान् प्रत्युवाच पितामहः । देवब्रह्मर्षिगन्धर्वान् सर्वान् मधुरया गिरा ॥ ५ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर भगवान् ब्रह्माने उन समस्त देवताओं, ब्रह्मर्षियों और गन्धर्वोंसे मधुर वाणीमें कहा— ॥ ५ ॥
यत् तत् परं भविष्यं च भवितव्यं च यत्परम् । भूतात्मा च प्रभुश्चैव ब्रह्म यच्च परं पदम् ॥ ६ ॥ तेनास्मि कृतसंवादः प्रसन्नेन सुरर्षभाः । जगतोऽनुग्रहार्थाय याचितो मे जगत्पतिः ॥ ७ ॥ मानुषं लोकमातिष्ठ वासुदेव इति श्रुतः । असुराणां वधार्थाय सम्भवस्व महीतले ॥ ८ ॥ 'श्रेष्ठ देवताओ! जो परम तत्त्व हैं, भूत, भविष्य और वर्तमान—तीनों जिनके उत्कृष्ट स्वरूप हैं तथा जो इन सबसे विलक्षण हैं, जिन्हें सम्पूर्ण भूतोंका आत्मा और सर्वशक्तिमान् प्रभु कहा गया है, जो परम ब्रह्म और परम पदके नामसे विख्यात हैं, उन्हीं परमात्माने मुझे