महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1904, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंयत् तत् पुरुषसंज्ञं वै गीयते ज्ञायते न च ॥ १६ ॥
एतत् परमकं तेज एतत् परमकं सुखम् ।
एतत् परमकं सत्यं कीर्तितं विश्वकर्मणा ॥ १७ ॥
‘ये ही पुरुष नामसे कहे जाते हैं, किंतु इनका वास्तविक रूप जाना नहीं जा सकता। ये ही विश्वस्रष्टा ब्रह्माजीके द्वारा परम सुख, परम तेज और परम सत्य कहे गये हैं॥ १६-१७॥
तस्मात् सेन्द्रैः सुरैः सर्वैर्लोकैश्चामितविक्रमः ।
नावज्ञेयो वासुदेवो मानुषोऽयमिति प्रभुः ॥ १८ ॥
‘इसलिये ‘ये मनुष्य हैं,’ ऐसा समझकर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवताओं तथा संसारके मनुष्योंको अमित पराक्रमी भगवान् वासुदेवकी अवहेलना नहीं करनी चाहिये॥
यश्च मानुषमात्रोऽयमिति ब्रूयात् स मन्दधीः ।
हृषीकेशमवज्ञानात् तमाहुः पुरुषाधमम् ॥ १९ ॥
‘जो सम्पूर्ण इन्द्रियोंके स्वामी इन भगवान् वासुदेवको केवल मनुष्य कहता है, वह मूर्ख है। भगवान्की अवहेलना करनेके कारण उसे नराधम कहा गया है॥ १९॥
योगिनं तं महात्मानं प्रविष्टं मानुषीं तनुम् ।
अवमन्येद् वासुदेवं तमाहुस्तामसं जनाः ॥ २० ॥
‘भगवान् वासुदेव साक्षात् परमात्मा हैं और योगशक्तिसे सम्पन्न होनेके कारण उन्होंने मानव-शरीरमें प्रवेश किया है। जो उनकी अवहेलना करता है, उसे ज्ञानी पुरुष तमोगुणी बताते हैं॥ २०॥
देवं चराचरात्मानं श्रीवत्साङ्कं सुवर्चसम् ।
पद्मनाभं च जानाति तमाहुस्तामसं बुधाः ॥ २१ ॥
‘जो चराचरस्वरूप श्रीवत्सचिह्नभूषित उत्तम कान्तिसे सम्पन्न भगवान् पद्मनाभको नहीं जानता, उसे विद्वान् पुरुष तमोगुणी कहते हैं॥ २१॥
किरीटकौस्तुभधरं मित्राणामभयंकरम् ।
अवजानन् महात्मानं घोरे तमसि मज्जति ॥ २२ ॥
‘जो किरीट और कौस्तुभमणि धारण करनेवाले तथा मित्रों (भक्तजनों)-को अभय देनेवाले हैं, उन परमात्माकी अवहेलना करनेवाला मनुष्य घोर नरकमें डूबता है॥ २२॥
एवं विदित्वा तत्त्वार्थं लोकानामीश्वरेश्वरः ।
वासुदेवो नमस्कार्यः सर्वलोकैः सुरोत्तमाः ॥ २३ ॥
‘सुरश्रेष्ठगण! इस प्रकार तात्त्विक वस्तुको समझकर सब लोगोंको लोकेश्वरोंके भी ईश्वर भगवान् वासुदेवको नमस्कार करना चाहिये’॥ २३॥
भीष्म उवाच