महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1906, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंतात! वेदोंके पारंगत विद्वान् महर्षियोंने तथा मैंने तुमको मना किया था कि तुम धनुर्धर भगवान् वासुदेवके साथ विरोध न करो, पाण्डवोंके साथ लोहा न लो; परंतु मोहवश तुमने इन बातोंका कोई मूल्य नहीं समझा। मैं समझता हूँ, तुम कोई क्रूर राक्षस हो; क्योंकि राक्षसोंके ही समान तुम्हारी बुद्धि सदा तमोगुणसे आच्छन्न रहती है ।। ३०-३१ ।।
यस्माद् द्विषि गोविन्दं पाण्डवं तं धनंजयम् । नरनारायणौ देवौ कोऽन्यो द्विष्याद्धि मानवः ।। ३२ ।। तुम भगवान् गोविन्द तथा पाण्डुनन्दन धनंजयसे द्वेष करते हो। वे दोनों ही नर और नारायण देव हैं। तुम्हारे सिवा दूसरा कौन मनुष्य उनसे द्वेष कर सकता है? ।। ३२ ।।
तस्माद् ब्रवीमि ते राजन्नेष वै शाश्वतोऽव्ययः । सर्वलोकमयो नित्यः शास्ता धात्रीधरो ध्रुवः ।। ३३ ।। राजन्! इसलिये तुम्हें यह बता रहा हूँ कि ये भगवान् श्रीकृष्ण सनातन, अविनाशी, सर्वलोकस्वरूप, नित्य शासक, धरणीधर एवं अविचल हैं ।। ३३ ।।
यो धारयति लोकांस्त्रींश्चराचरगुरुः प्रभुः । योद्धा जयश्च जेता च सर्वप्रकृतिरीश्वरः ।। ३४ ।। ये चराचरगुरु भगवान् श्रीहरि तीनों लोकोंको धारण करते हैं। ये ही योद्धा हैं, ये ही विजय हैं और ये ही विजयी हैं। सबके कारणभूत परमेश्वर भी ये ही हैं ।। ३४ ।।
राजन् सर्वमयो ह्येष तमोरागविवर्जितः । यतः कृष्णस्ततो धर्मो यतो धर्मस्ततो जयः ।। ३५ ।। राजन्! ये श्रीहरि सर्वस्वरूप और तम एवं रागसे रहित हैं। जहाँ श्रीकृष्ण हैं, वहाँ धर्म है और जहाँ धर्म है, वहीं विजय है ।। ३५ ।।
तस्य माहात्म्ययोगेन योगेनात्ममयेन च । धृताः पाण्डुसुता राजन् जयश्चैषां भविष्यति ।। ३६ ।। उनके माहात्म्ययोगसे तथा आत्मस्वरूपयोगसे समस्त पाण्डव सुरक्षित हैं। राजन्! इसीलिये इनकी विजय होगी ।। ३६ ।।
श्रेयोयुक्तां सदा बुद्धिं पाण्डवानां दधाति यः । बलं चैव रणे नित्यं भयेभ्यश्चैव रक्षति ।। ३७ ।। वे पाण्डवोंको सदा कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं, युद्धमें बल देते हैं और भयसे नित्य उनकी रक्षा करते हैं ।। ३७ ।।
स एष शाश्वतो देवः सर्वगुह्यमयः शिवः । वासुदेव इति ज्ञेयो यन्मां पृच्छसि भारत ।। ३८ ।। भारत! जिनके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे हो, वे सनातन देवता सर्वगुह्यमय कल्याणस्वरूप परमात्मा ही 'वासुदेव' नामसे जाननेयोग्य हैं ।। ३८ ।।
ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्च कृतलक्षणैः ।