भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1913, कुल 2343 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1913

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टषष्टितमोऽध्यायः

ब्रह्मभूतस्तोत्र तथा श्रीकृष्ण और अर्जुनकी महत्ता

भीष्म उवाच

शृणु चेदं महाराज ब्रह्मभूतं स्तवं मम ।
ब्रह्मर्षिभिश्च देवैश्च यः पुरा कथितो भुवि ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—महाराज दुर्योधन! पूर्वकालमें इस भूतलपर ब्रह्मर्षियों तथा देवताओंने इनका जो ब्रह्मभूतस्तोत्र कहा है, उसे तुम मुझसे सुनो— ॥ १ ॥

साध्यानामपि देवानां देवदेवेश्वरः प्रभुः ।
लोकभावनभावज्ञ इति त्वां नारदोऽब्रवीत् ॥ २ ॥
‘प्रभो! आप साध्यगण और देवताओंके भी स्वामी एवं देवदेवेश्वर हैं। आप सम्पूर्ण जगत्‌के हृदयके भावोंको जाननेवाले हैं। आपके विषयमें नारदजीने ऐसा ही कहा है ॥ २ ॥

भूतं भव्यं भविष्यं च मार्कण्डेयोऽभ्युवाच ह ।
यज्ञं त्वां चैव यज्ञानां तपश्च तपसामपि ॥ ३ ॥
‘मार्कण्डेयजीने आपको भूत, भविष्य और वर्तमान स्वरूप बताया है। वे आपको यज्ञोंका यज्ञ और तपस्याओंका भी सारभूत तप बताया करते हैं ॥ ३ ॥

देवानामपि देवं च त्वामाह भगवान् भृगुः ।
पुराणं चैव परमं विष्णो रूपं तवेति च ॥ ४ ॥
‘भगवान् भृगुने आपको देवताओंका भी देवता कहा है। विष्णो! आपका रूप अत्यन्त पुरातन और उत्कृष्ट है ।।

वासुदेवो वसूनां त्वं शक्रं स्थापयिता तथा ।
देव देवोऽसि देवानामिति द्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ ५ ॥
‘प्रभो! आप वसुओंके वासुदेव तथा इन्द्रको स्वर्गके राज्यपर स्थापित करनेवाले हैं। देव! आप देवताओंके भी देवता हैं। महर्षि द्वैपायन आपके विषयमें ऐसा ही कहते हैं ॥ ५ ॥

पूर्वे प्रजानिसर्गे च दक्षमाहुः प्रजापतिम् ।
स्रष्टारं सर्वलोकानामङ्गिस्त्वां तथाब्रवीत् ॥ ६ ॥
‘प्रथम प्रजासृष्टिके समय आपको ही दक्ष प्रजापति कहा गया है। आप ही सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा हैं—इस प्रकार अंगिरा मुनि आपके विषयमें कहते हैं ॥ ६ ॥

अव्यक्तं ते शरीरोत्थं व्यक्तं ते मनसि स्थितम् ।
देवास्त्वत्सम्भवाश्चैव देवलस्त्वसितोऽब्रवीत् ॥ ७ ॥