महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1915, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! उस समय शान्तनुनन्दन भीष्मजीने पुनः दुर्योधनसे कहा—'नरेश्वर! तुमने महात्मा केशव तथा नरस्वरूप अर्जुनका यथार्थ माहात्म्य, जिसके विषयमें तुम मुझसे पूछ रहे थे, मुझसे अच्छी तरह सुन लिया।। १४ १/२ ।। यदर्थं नृषु सम्भूतौ नरनारायणावृषी ।। १५ ।। अवध्यौ च यथा वीरौ संयुगेष्वपराजितौ । यथा च पाण्डवा राजन्नवध्या युधि कस्यचित् ।। १६ ।। 'ऋषि नर और नारायण जिस उद्देश्यसे मनुष्योंमें अवतीर्ण हुए हैं, वे दोनों अपराजित वीर जिस प्रकार युद्धमें अवध्य हैं तथा समस्त पाण्डव भी जिस प्रकार समरभूमिमें किसीके लिये भी वध्य नहीं हैं, वह सब विषय तुमने अच्छी तरह सुन लिया।। १५-१६ ।। प्रीतिमान् हि दृढं कृष्णः पाण्डवेषु यशस्विषु । तस्माद् ब्रवीमि राजेन्द्र शमो भवतु पाण्डवैः ।। १७ ।। 'राजेन्द्र! भगवान् श्रीकृष्ण यशस्वी पाण्डवोंपर बहुत प्रसन्न हैं। इसीलिये मैं कहता हूँ कि पाण्डवोंके साथ तुम्हारी संधि हो जाय ।। १७ ।। पृथिवीं भुङ्क्ष्व सहितो भ्रातृभिर्बलिभिर्वशी । नरनारायणौ देवाववज्ञाय नशिष्यसि ।। १८ ।। 'वे तुम्हारे बलवान् भाई हैं। तुम अपने मनको वशमें रखते हुए उनके साथ मिलकर पृथ्वीका राज्य भोगो। भगवान् नर-नारायण (अर्जुन और श्रीकृष्ण)-की अवहेलना करके तुम नष्ट हो जाओगे ।। १८ ।। एवमुक्त्वा तव पिता तूष्णीमासीद् विशाम्पते । व्यसर्जयच्च राजानं शयनं च विवेश ह ।। १९ ।। प्रजानाथ! ऐसा कहकर आपके ताऊ भीष्मजी चुप हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने राजा दुर्योधनको विदा किया और स्वयं शयन करने चले गये ।। १९ ।। राजा च शिविरं प्रायात् प्रणिपत्य महात्मने । शिश्ये च शयने शुभ्रे रात्रिं तां भरतर्षभ ।। २० ।। भरतश्रेष्ठ! राजा दुर्योधन भी महात्मा भीष्मको प्रणाम करके अपने शिविरमें चला आया और अपनी शुभ्र शय्यापर सो गया ।। २० ।।
इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि विश्वोपाख्याने अष्टषष्टितमोऽध्यायः ।। ६८ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें विश्वोपाख्यानविषयक अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।