भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1918, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1918

भीष्ममासाद्य संग्रामे छादयामास सायकैः ।। १३ ।। तदनन्तर भीमसेनने रणक्षेत्रमें प्रवेश करके मकर-व्यूहके मुखभागमें खड़े हुए भीष्मको अपने सायकोंसे आच्छादित कर दिया ।। १३ ।। ततो भीष्मो महास्त्राणि पातयामास भारत । मोहयन् पाण्डुपुत्राणां व्यूढं सैन्यं महाहवे ।। १४ ।। भारत! तब उस महासमरमें पाण्डवोंकी उस व्यूहबद्ध सेनाको मोहित करते हुए भीष्म उसपर बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्रयोग करने लगे ।। १४ ।। सम्मुह्यति तदा सैन्ये त्वरमाणो धनंजयः । भीष्मं शरसहस्रेण विव्याध रणमूर्धनि ।। १५ ।। उस समय अपनी सेनाको मोहित होती देख अर्जुनने बड़ी उतावलीके साथ युद्धके मुहानेपर एक हजार बाणोंकी वर्षा करके भीष्मको घायल कर दिया ।। १५ ।। प्रतिसंवार्य चास्त्राणि भीष्ममुक्तानि संयुगे । स्वेनानीकेन हृष्टेन युद्धाय समुपस्थितः ।। १६ ।। संग्राममें भीष्मके छोड़े हुए सम्पूर्ण अस्त्रोंका निवारण करके हर्षमें भरी हुई अपनी सेनाके साथ वे युद्धके लिये उपस्थित हुए ।। १६ ।। ततो दुर्योधनो राजा भारद्वाजमभाषत । पूर्वं दृष्ट्वा वधं घोरं बलस्य बलिनां वरः ।। १७ ।। भ्रातॄणां च वधं युद्धे स्मरमाणो महारथः । आचार्य सततं हि त्वं हितकामो ममानघ ।। १८ ।। तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महारथी राजा दुर्योधनने पहले जो अपनी सेनाका घोर संहार हुआ था, उसको दृष्टिमें रखते हुए और युद्धमें भाइयोंके वधका स्मरण करते हुए भरद्वाजनन्दन द्रोणाचार्यसे कहा— 'निष्पाप आचार्य! आप सदा ही मेरा हित चाहनेवाले हैं ।। १७-१८ ।। वयं हि त्वां समाश्रित्य भीष्मं चैव पितामहम् । देवानपि रणे जेतुं प्रार्थयामो न संशयः ।। १९ ।। किमु पाण्डुसुतान् युद्धे हीनवीर्यपराक्रमान् । स तथा कुरु भद्रं ते यथा वध्यन्ति पाण्डवाः ।। २० ।। ‘हमलोग आप तथा पितामह भीष्मकी शरण लेकर देवताओंको भी समरभूमिमें जीतनेकी अभिलाषा रखते हैं, इसमें संशय नहीं है। फिर जो बल और पराक्रममें हीन हैं, उन पाण्डवोंको जीतना कौन बड़ी बात है। आपका कल्याण हो। आप ऐसा प्रयत्न करें जिससे पाण्डव मारे जायँ' ।। १९-२० ।। एवमुक्तस्ततो द्रोणस्तव पुत्रेण मारिष । (उवाच तत्र राजानं संक्रुद्ध इव निःश्वसन् ।