भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1965, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1965

‘भीम एकमात्र युद्धके पथपर गये हैं और मैं भी युद्धस्थलमें उपस्थित हूँ। ऐसी दशामें यदि भीमसेनके बिना ही लौट जाऊँ तो क्षत्रियसमाज मुझे क्या कहेगा? ॥ २८ ॥ अस्वस्ति तस्य कुर्वन्ति देवाः शक्रपुरोगमाः । यः सहायान् परित्यज्य स्वस्तिमानाब्रजेद् गृहम् ॥ २९ ॥ ‘जो अपने सहायकोंको छोड़कर स्वयं कुशल-पूर्वक घरको लौट आता है, उसका इन्द्र आदि देवता अनिष्ट करते हैं’ ॥ २९ ॥ मम भीमः सखा चैव सम्बन्धी च महाबलः । भक्तोऽस्मान् भक्तिमांश्चाहं तमप्यरिनिषूदनम् ॥ ३० ॥ ‘महाबली भीम मेरे सखा और सम्बन्धी हैं। वे हम लोगोंके भक्त हैं और मैं भी उन शत्रुसूदन भीमका भक्त हूँ ॥ सोऽहं तत्र गमिष्यामि यत्र यातो वृकोदरः । निघ्नन्तं मां रिपून् पश्य दानवानिव वासवम् ॥ ३१ ॥ ‘अतः मैं भी वहीं जाऊँगा जहाँ भीमसेन गये हैं। देखो जैसे इन्द्र दानवोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार मैं भी शत्रुसेनाका विनाश कर रहा हूँ’ ॥ ३१ ॥ एवमुक्त्वा ततो वीरो ययौ मध्येन भारत । भीमसेनस्य मार्गेषु गदाप्रमथितैर्गजैः ॥ ३२ ॥ भारत! ऐसा कहकर वीरवर धृष्टद्युम्न भीमसेनके बनाये हुए मार्गोंसे कौरव-सेनाके भीतर गये। उन मार्गोंपर गदाके मारे हुए हाथी पड़े थे ॥ ३२ ॥ स ददर्श तदा भीमं दहन्तं रिपुवाहिनीम् । वातो वृक्षानिव बलात् प्रभञ्जन्तं रणे रिपून् ॥ ३३ ॥ उस समय कुछ दूर जाकर धृष्टद्युम्नने शत्रुसेनाको दग्ध करते हुए भीमसेनको देखा। जैसे आँधी वृक्षोंको बलपूर्वक तोड़ देती या उखाड़ डालती है, उसी प्रकार भीमसेन भी रणभूमिमें शत्रुओंका संहार कर रहे थे ॥ ते वध्यमानाः समरे रथिनः सादिनस्तथा । पादाता दन्तिनश्चैव चक्रुरार्तस्वरं महत् ॥ ३४ ॥ समरांगणमें भीमसेनके मारे हुए रथी, घुड़सवार, पैदल और सवारोंसहित हाथी बड़े जोरसे आर्तनाद कर रहे थे ॥ ३४ ॥ हाहाकारश्च संजज्ञे तव सैन्यस्य मारिष । वध्यतो भीमसेनेन कृतिना चित्रयोधिना ॥ ३५ ॥ आर्य! विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले विद्वान् भीमसेनके द्वारा मारी जाती हुई आपकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ ३५ ॥ ततः कृतास्त्रास्ते सर्वे परिवार्य वृकोदरम् । अभीताः समवर्तन्त शस्त्रवृष्ट्या परंतप ॥ ३६ ॥