महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1985, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथापरेण भल्लेन सुयुक्तेनाशुपातिना । दुष्कर्णं सुदृढं क्रुद्धो विव्याध हृदये भृशम् ॥ ५१ ॥ स पपात ततो भूमौ वज्राहत इव द्रुमः । तत्पश्चात् लक्ष्यको शीघ्र मार गिरानेवाले एक दूसरे भल्ल नामक बाणका उत्तम रीतिसे प्रयोग करके क्रोधमें भरे हुए शतानीकने दुष्कर्णके हृदयमें अत्यन्त गहरा आघात किया। इससे दुष्कर्ण वज्राहत वृक्षकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ५१ १/२ ॥
दुष्कर्णं व्यथितं दृष्ट्वा पञ्च राजन् महारथाः ॥ ५२ ॥ जिघांसन्तः शतानीकं सर्वतः पर्यवारयन् । राजन्! दुष्कर्णको आघातसे पीड़ित देख पाँच महारथियोंने शतानीकको मार डालनेकी इच्छासे उसे सब ओरसे घेर लिया ॥ ५२ १/२ ॥
छाद्यमानं शरव्रातैः शतानीकं यशस्विनम् ॥ ५३ ॥ अभ्यधावन्त संक्रुद्धाः केकयाः पञ्च सोदराः । उनके बाणसमूहोंसे यशस्वी शतानीकको आच्छादित होते देख क्रोधमें भरे हुए पाँच भाई केकयराजकुमारोंने उन पाँचों महारथियोंपर धावा किया ॥ ५३ १/२ ॥
तानभ्यापततः प्रेक्ष्य तव पुत्रा महारथाः ॥ ५४ ॥ प्रत्युद्ययुर्महाराज गजानिव महागजाः । महाराज! उन्हें आते देख आपके महारथी पुत्र उनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े, जैसे हाथी दूसरे हाथियोंसे भिड़नेके लिये आगे बढ़ते हैं ॥ ५४ १/२ ॥
दुर्मुखो दुर्जयश्चैव तथा दुर्मर्षणो युवा ॥ ५५ ॥ शत्रुञ्जयः शत्रुसहः सर्वे क्रुद्धा यशस्विनः । प्रत्युद्याता महाराज केकयान् भ्रातरः समम् ॥ ५६ ॥ नरेश्वर! दुर्मुख, दुर्जय, युवा वीर दुर्मर्षण, शत्रुंजय तथा शत्रुसह—ये सब-के-सब यशस्वी वीर क्रोधमें भरकर पाँचों भाई केकयोंका सामना करनेके लिये एक साथ आगे बढ़े ॥ ५५-५६ ॥
रथैर्नगरसंकाशैर्हयैर्युक्तैर्मनोजवैः । नानावर्णविचित्राभिः पताकाभिरलंकृतैः ॥ ५७ ॥ वरचापधरा वीरा विचित्रकवचध्वजाः । विविशुस्ते परं सैन्यं सिंहा इव वनाद् वनम् ॥ ५८ ॥ उनके रथ नगरोंके समान प्रतीत होते थे। उनमें मनके समान वेगशाली घोड़े जुते हुए थे। नाना प्रकारके रूप-रंगवाली और विचित्र पताकाएँ उन्हें अलंकृत कर रही थीं। ऐसे रथोंपर आरूढ़ सुन्दर धनुष धारण किये विचित्र कवच और ध्वजोंसे सुशोभित उन वीरोंने शत्रुंकी सेनामें उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे सिंह एक वनसे दूसरे वनमें प्रवेश करते हैं ॥ ५७-५८ ॥