भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 199, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 199

सूत! मेरी भी सदा यही अभिलाषा है कि दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे। ‘कुन्तीकुमारो! कौरवोंसे संधि करो, उनके प्रति शान्त बने रहो,’ इसके सिवा दूसरी कोई बात मैं पाण्डवोंके सामने नहीं कहता हूँ। राजा युधिष्ठिरके मुँहसे भी ऐसा ही प्रिय वचन सुनता हूँ और स्वयं भी इसीको ठीक मानता हूँ॥ २ ॥ सुदुष्करस्तत्र शमो हि नूनं प्रदर्शितः संजय पाण्डवेन । यस्मिन् गृद्धो धृतराष्ट्रः सपुत्रः कस्मादेषां कलहो नावमूर्च्छेत् ॥ ३ ॥ संजय! जैसा कि पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने प्रकट किया है, राज्यके प्रश्नोंको लेकर दोनों पक्षोंमें शान्ति बनी रहे, यह अत्यन्त दुष्कर जान पड़ता है। पुत्रों-सहित धृतराष्ट्र (इनके स्वत्वरूप) जिस राज्यमें आसक्त होकर उसे लेनेकी इच्छा करते हैं, उसके लिये इन कौरव-पाण्डवोंमें कलह कैसे नहीं बढ़ेगा? ॥ ३ ॥ न त्वं धर्मं विचारं संजयेह मत्तश्च जानासि युधिष्ठिराच्च । अथो कस्मात् संजय पाण्डवस्य उत्साहिनः पूरयतः स्वकर्म ॥ ४ ॥ यथाऽऽख्यातमावसतः कुटुम्बे पुरा कस्मात् साधुविलोपमात्थ । अस्मिन् विधौ वर्तमाने यथाव- दुच्चावचा मतयो ब्राह्मणानाम् ॥ ५ ॥ संजय! तुम यह अच्छी तरह जानते हो कि मुझसे और युधिष्ठिरसे धर्मका लोप नहीं हो सकता, तो भी जो उत्साहपूर्वक स्वधर्मका पालन करते हैं तथा शास्त्रोंमें जैसा बताया गया है, उसके अनुसार ही कुटुम्ब (गृहस्थाश्रम)-में रहते हैं, उन्हीं पाण्डुकुमार युधिष्ठिरके धर्मलोपकी चर्चा या आशंका तुमने पहले किस आधारपर की है? गृहस्थ आश्रममें रहनेकी जो शास्त्रोक्त विधि है, उसके होते हुए भी इसके ग्रहण अथवा त्यागके विषयमें वेदज्ञ ब्राह्मणोंके भिन्न-भिन्न विचार हैं ॥ ४-५ ॥ कर्मणाऽऽहुः सिद्धिमेके परत्र हित्वा कर्म विद्यया सिद्धिमेके । नाभुञ्जानो भक्ष्यभोज्यस्य तृप्येद् विद्वानपीह विहितं ब्राह्मणानाम् ॥ ६ ॥ कोई तो (गृहस्थाश्रममें रहकर) कर्मयोगके द्वारा ही परलोकमें सिद्धि-लाभ होनेकी बात बताते हैं,* दूसरे लोग कर्मको त्यागकर ज्ञानके द्वारा ही सिद्धि (मोक्ष)-का प्रतिपादन करते हैं।