भारतकोश
महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

पृष्ठ 1991, कुल 2343 में से

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पृष्ठ 1991

तदाज्ञया तानि विनिर्ययुर्द्रुतं गजाश्वपादातरथायुतानि ॥ १३ ॥ तदनन्तर दुर्योधनने हर्षमें भरकर सम्पूर्ण राजाओं तथा सारी सेनाओंसे कहा—'युद्धके लिये निकलो।' राजा दुर्योधनकी आज्ञा पाकर सहस्रों हाथी, घोड़े, पैदल तथा रथोंसे भरी हुई वे सारी सेनाएँ तुरंत रणके लिये प्रस्थित हुईं ॥ १३ ॥

प्रहर्षयुक्तानि तु तानि राजन् महान्ति नानाविधशस्त्रवन्ति । स्थितानि नागाश्वपदातिमन्ति विरेजुराजौ तव राजन् बलानि ॥ १४ ॥ महाराज! आपकी वे विशाल सेनाएँ नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो अत्यन्त हर्ष एवं उत्साहमें भरी हुई थीं। राजन्! घोड़े, हाथी और पैदलोंसे युक्त हो रणभूमिमें खड़ी हुई उन सेनाओंकी बड़ी शोभा होती थी ॥ १४ ॥

शस्त्रास्त्रविद्भिर्नरवीरयोधै- रधिष्ठिताः सैन्यगणास्त्वदीयाः । रथौघपादातगजाश्वसंघैः प्रयाद्भिराजौ विधिवत् प्रणुन्नैः ॥ १५ ॥ समुद्धतं वै तरुणार्कवर्णं रजो बभौच्छादयन् सूर्यरश्मीन् । रेजुः पताका रथदन्तिसंस्था वातेरिता भ्राम्यमाणाः समन्तात् ॥ १६ ॥ आपकी सेनाओंके सेनापति अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता एवं नरवीर योद्धा थे। उनसे विधिपूर्वक अनुशासित हो रथसमूह, पैदल, हाथी और घोड़ोंके समुदाय जब युद्ध-भूमिमें जाने लगे, तब उनके पैरोंसे उठी हुई धूल सूर्यकी किरणोंको आच्छादित करके प्रातःकालिक सूर्यकी प्रभाके समान कान्तिमती प्रतीत होने लगी। रथों और हाथियोंपर खड़ी की हुई पताकाएँ चारों ओर वायुकी प्रेरणासे फहराती हुई बड़ी शोभा पा रही थीं ॥

नानाङ्गाः समरे तत्र राजन् मेघैर्युता विद्युतः खे यथैव । वृन्दैः स्थिताश्चापि सुसम्प्रयुक्ता- श्चकाशिरे दन्तिगणाः समन्तात् ॥ १७ ॥ राजन्! जैसे आकाशमें बादलोंके साथ बिजलियाँ चमक रही हों, उसी प्रकार उस समरांगणमें चारों ओर अनेक रंगोंके दन्तार हाथी झुंड-के-झुंड खड़े हुए शोभा पा रहे थे। उनका संचालन सुन्दर ढंगसे हो रहा था ॥ १७ ॥

धनूंषि विस्फारयतां नृपाणां

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