महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2005, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंअलम्बुषं शरैस्तीक्ष्णैर्विव्याध बलिनां वरः ॥ ३९ ॥ इधर बलवानोंमें श्रेष्ठ सात्यकिने भी अत्यन्त कुपित होकर अपने तीखे बाणोंद्वारा संग्रामभूमिमें क्रूर राक्षस अलम्बुषको बींध डाला ॥ ३९ ॥
राक्षसेन्द्रस्ततस्तस्य धनुश्छिच्छेद भारत । अर्धचन्द्रेण समरे तं च विव्याध सायकैः ॥ ४० ॥ भारत! तब राक्षसराज अलम्बुषने रणक्षेत्रमें अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा सात्यकिके धनुषको काट दिया और अनेक सायकोंका प्रहार करके उन्हें भी घायल कर दिया ॥ ४० ॥
मायां च राक्षसीं कृत्वा शरवर्षैरवाकिरत् । तत्राद्भुतमपश्याम शैनेयस्य पराक्रमम् ॥ ४१ ॥ तत्पश्चात् उसने राक्षसी माया फैलाकर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ की। उस समय हमने सात्यकिका अद्भुत पराक्रम देखा ॥ ४१ ॥
असम्भ्रमस्तु समरे वध्यमानः शितैः शरैः । ऐन्द्रमस्त्रं च वार्ष्णेयो योजयामास भारत ॥ ४२ ॥ विजयाद् यदनुप्राप्तं माधवेन यशस्विना । भारत! वे समरभूमिमें तीखे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी घबराये नहीं। उन यशस्वी यदुकुलरत्न सात्यकिने अर्जुनसे जिसकी शिक्षा प्राप्त की थी, उस ऐन्द्रास्त्रका प्रयोग किया ॥ ४२ १/२ ॥
तदस्त्रं भस्मसात् कृत्वा मायां तां राक्षसीं तदा ॥ ४३ ॥ अलम्बुषं शरैरन्यैरभ्याकिरत सर्वतः । पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकः ॥ ४४ ॥ उस समय उस दिव्यास्त्रने उस राक्षसी मायाको तत्काल भस्म करके अलम्बुषके ऊपर सब ओरसे दूसरे-दूसरे बाणोंकी उसी प्रकार वर्षा आरम्भ की, जैसे वर्षा-ऋतुमें मेघ पर्वतपर जलकी धाराएँ गिराता है ॥ ४३-४४ ॥
तत् तथा पीडितं तेन माधवेन यशस्विना । प्रदुद्राव भयाद् रक्षस्त्यक्त्वा सात्यकिमाहवे ॥ ४५ ॥ परमयशस्वी मधुवंशी सात्यकिके द्वारा इस प्रकार पीड़ित होनेपर वह राक्षस भयसे युद्धस्थलमें उन्हें छोड़कर भाग गया ॥ ४५ ॥
तमजेयं राक्षसेन्द्रं संख्ये मघवता अपि । शैनेयः प्राणदज्जित्वा योधानां तव पश्यताम् ॥ ४६ ॥ जिसे इन्द्र भी युद्धमें हरा नहीं सकते थे, उसी राक्षसराज अलम्बुषको आपके योद्धाओंके देखते-देखते परास्त करके सात्यकि सिंहनाद करने लगे ॥ ४६ ॥
न्यहनत् तावकांश्चापि सात्यकिः सत्यविक्रमः । निशितैर्बहुभिर्बाणैस्तेऽद्रवन्त भयार्दिताः ॥ ४७ ॥