महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2014, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंघोड़ोंके मारे जानेपर भी उसी रथपर खड़े हुए प्रतापी राक्षसराज घटोत्कचने भगदत्तके हाथीपर बड़े वेगसे शक्तिका प्रहार किया ।। ३८ ।। तामापतन्तीं सहसा हेमदण्डां सुवेगिनीम् । त्रिधा चिच्छेद नृपतिः सा व्यकीर्यत मेदिनीम् ॥ ३९ ॥ उस शक्तिमें सोनेका डंडा लगा हुआ था। वह अत्यन्त वेगशालिनी थी। उसे सहसा आती देख राजा भगदत्तने उसके तीन टुकड़े कर डाले। फिर वह पृथ्वीपर बिखर गयी ।। शक्तिं विनिहतां दृष्ट्वा हैडिम्बः प्राद्रवद् भयात् । यथेन्द्रस्य रणात् पूर्वं नमुचिर्दैत्यसत्तमः ॥ ४० ॥ अपनी शक्तिको कटी हुई देखकर हिडिम्बाकुमार घटोत्कच भगदत्तके भयसे उसी प्रकार भाग गया, जैसे पूर्वकालमें देवराज इन्द्रके साथ युद्ध करते समय दैत्यराज नमुचि रणभूमिसे भागा था ।। ४० ।। तं विजित्य रणे शूरं विक्रान्तं ख्यातपौरुषम् । अजेयं समरे वीरं यमेन वरुणेन च ॥ ४१ ॥ पाण्डवीं समरे सेनां सम्ममर्द स कुञ्जरः । यथा वनगजो राजन् मृद्नंश्चरति पद्मिनीम् ॥ ४२ ॥ राजन्! घटोत्कच अपने पौरुषके लिये विख्यात, पराक्रमी, शूरवीर था। वरुण और यमराज भी उस वीरको समरभूमिमें परास्त नहीं कर सकते थे। उसीको वहाँ रणक्षेत्रमें जीतकर भगदत्तका वह हाथी समरांगणमें पाण्डवसेनाका उसी प्रकार मर्दन करने लगा, जैसे वनैला हाथी सरोवरमें कमलिनीको रौंदता हुआ विचरता है ।। ४१-४२ ।। मद्रेश्वरस्तु समरे यमाभ्यां समसज्जत । स्वस्त्रीयौ छादयांचक्रे शरौघैः पाण्डुनन्दनौ ॥ ४३ ॥ दूसरी ओर मद्रराज शल्य युद्धमें अपने भानजे नकुल और सहदेवसे उलझे हुए थे। उन्होंने पाण्डुकुलको आनन्दित करनेवाले भानजोंको अपने बाणसमूहोंसे आच्छादित कर दिया ।। ४३ ।। सहदेवस्तु समरे मातुलं दृश्य संगतम् । अवारयच्छरौघेण मेघो यद्वद् दिवाकरम् ॥ ४४ ॥ सहदेवने समरभूमिमें अपने मामाको युद्धमें आसक्त देखकर जैसे बादल सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार उन्हें अपने बाणसमूहोंसे आच्छादित करके आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ४४ ।। छाद्यमानः शरौघेण हृष्टरूपतरोऽभवत् । तयोश्चाप्यभवत् प्रीतिरतुला मातृकारणात् ॥ ४५ ॥ उनके बाणसमूहोंसे आच्छादित होकर भी शल्य अत्यन्त प्रसन्न ही हुए। माताके नाते नकुल और सहदेवके मनमें भी उनके प्रति अनुपम प्रेमका भाव था ।। ४५ ।।