महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2022, कुल 2343 में से
संदर्भ में पढ़ेंधरणीं समनुप्राप्तौ सर्वभूतनिषेविताम् ॥ ३१ ॥
तलवारकी गहरी चोटसे घायल होकर वे दोनों पुरुषश्रेष्ठ सम्पूर्ण भूतोंकी निवासभूत पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ३१ ॥
मूर्छयाभिपरीताङ्गौ व्यायामेन तु मोहितौ ।
ततोऽभ्यधावद् वेगेन करकर्षः सुहृत्तया ॥ ३२ ॥
चेकितानं तथाभूतं दृष्ट्वा समरदुर्मदः ।
रथमारोपयच्चैनं सर्वसैन्यस्य पश्यतः ॥ ३३ ॥
उनके सारे अंगोंमें मूर्च्छा व्याप्त हो रही थी। दोनों ही अधिक परिश्रमके कारण अचेत हो गये थे। उस समय युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाला करकर्ष चेकितानको वैसी अवस्थामें पड़ा देख सौहार्दके नाते बड़े वेगसे दौड़ा और सम्पूर्ण सेनाके देखते-देखते उसने उन्हें अपने रथपर चढ़ा लिया ॥ ३२-३३ ॥
तथैव शकुनिः शूरः श्यालस्तव विशाम्पते ।
आरोपयद् रथं तूर्णं गौतमं रथिनां वरम् ॥ ३४ ॥
प्रजानाथ! इसी प्रकार आपके साले शूरवीर शकुनिने रथियोंमें श्रेष्ठ कृपाचार्यको शीघ्र ही अपने रथपर बैठा लिया ॥ ३४ ॥
सौमदत्तिं तथा क्रुद्धो धृष्टकेतुर्महाबलः ।
नवत्या सायकैः क्षिप्रं राजन् विव्याध वक्षसि ॥ ३५ ॥
राजन्! दूसरी ओर महाबली धृष्टकेतुने क्रोधमें भरकर नब्बे बाणोंसे शीघ्रतापूर्वक भूरिश्रवाकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३५ ॥
सौमदत्तिरुरःस्थैस्तैर्भृशं बाणैरशोभत ।
मध्यन्दिने महाराज रश्मिभिस्तपनो यथा ॥ ३६ ॥
महाराज! छातीमें धँसे हुए उन बाणोंसे भूरिश्रवा उसी प्रकार शोभा पाने लगा, जैसे दोपहरके समय सूर्य अपनी किरणोंद्वारा अधिक प्रकाशित होता है ॥ ३६ ॥
भूरिश्रवास्तु समरे धृष्टकेतुं महारथम् ।
हतसूतहयं चक्रे विरथं सायकोत्तमैः ॥ ३७ ॥
तब भूरिश्रवाने समरभूमिमें उत्तम सायकोंद्वारा महारथी धृष्टकेतुके घोड़ों और सारथिको मारकर उन्हें रथहीन कर दिया ॥ ३७ ॥
विरथं तं समालोक्य हताश्वं हतसारथिम् ।
महता शरवर्षेण च्छादयामास संयुगे ॥ ३८ ॥
भूरिश्रवाने धृष्टकेतुको घोड़े और सारथिके मारे जानेसे रथहीन हुआ देख युद्धस्थलमें बाणोंकी बड़ी भारी वर्षा करके ढक दिया ॥ ३८ ॥
स तु तं रथमुत्सृज्य धृष्टकेतुर्महामनाः ।
आरुरोह ततो यानं शतानीकस्य मारिष ॥ ३९ ॥